Sheetal P Singh
2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं हैं, बल्कि 15 साल की राजनीति, प्रशासन और नैरेटिव की व्यापक परीक्षा का परिणाम हैं. ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की हार को समझना हो तो इसे सिर्फ “anti-incumbency” कहकर टाला नहीं जा सकता. यह भरोसे के धीरे-धीरे क्षरण, गोवर्नेंस पर बढ़ते सवाल और narrative की लड़ाई में पिछड़ने की कहानी है.
सालों तक “मां, माटी, मानुष” का नारा जनता के दिल से जुड़ा रहा, लेकिन समय के साथ वही मॉडल स्थानीय स्तर पर सत्ता के केंद्रीकरण, कट-मनी के आरोप, भर्ती घोटालों और कमजोर कानून-व्यवस्था की शिकायतों में उलझ गया. बेरोजगारी, उद्योगों की कमी और प्रशासनिक सुस्ती ने खासकर युवाओं और मध्यवर्ग में निराशा पैदा की. दलालों की चौकरी के बीच घिरे सत्ताधीशों के लिए यह तथ्य एक सबक है.
इसे भी पढ़ें...
Sandeshkhali और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गुस्सा और अविश्वास बढ़ाया और यहां कहानी सिर्फ अपराध की नहीं थी, बल्कि राज्य की प्रतिक्रिया की भी थी. जब शासन “संवेदनशील और निर्णायक” दिखने में चूकता है, तब हर घटना प्रतीक बन जाती है.
यहीं एक और महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर असहज सच सामने आता है, बंगाल की चुनावी राजनीति में लंबे समय से हिंसा और भय का तत्व भी एक निर्णायक कारक रहा है. 2018 के पंचायत चुनावों में बड़ी संख्या में सीटें बिना मुकाबले जीती गईं और व्यापक हिंसा के आरोप लगे. 2019 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान भी कई जगह झड़पें, मौतें और बूथ-कब्ज़े की शिकायतें सामने आईं. विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि स्थानीय स्तर पर दबाव, धमकी और संगठनात्मक प्रभुत्व ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया.
इस बार भारत निर्वाचन आयोग ने करीब ढाई लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व तैनाती कर मतदान प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित और स्वतंत्र बनाने की कोशिश की. नतीजा यह हुआ कि कथित “स्थानीय प्रभाव” और भय का वह ढांचा, जो पहले कई क्षेत्रों में निर्णायक माना जाता था, काफी हद तक निष्प्रभावी हुआ और असली जनमत अधिक स्पष्ट रूप में सामने आया.
लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है. असली खेल नैरेटिव का भी था और उसमें भारतीय जनता पार्टी ने बढ़त बना ली. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने पिछले वर्षों में यह क्षमता विकसित की है कि वह विपक्षी राज्यों की घटनाओं को तेजी से राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दे. यह सिर्फ भाषणों से नहीं होता, यह बूथ स्तर के संगठन, केंद्रीकृत मैसेजिंग, और डिजिटल नेटवर्क के समन्वय से बनता है.
भारतीय जनता पार्टी आईटी सेल जैसे तंत्र, और एक्स (ट्विटर), फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर coordinated amplification ने यह तय किया कि कौन-सी घटना “राष्ट्रीय मुद्दा” बनेगी और कौन-सी स्थानीय खबर बनकर रह जाएगी. सूचना अब सिर्फ सूचना नहीं रही, यह एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है.
यहीं विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है. अलग-अलग राज्यों में बिखरी पार्टियां, कमजोर डिजिटल पकड़ और असंगत मैसेजिंग, इन सबने मिलकर उन्हें narrative battle में पीछे कर दिया. परिणाम यह हुआ कि BJP शासित राज्यों में होने वाली गंभीर घटनाएं भी उसी स्तर का राष्ट्रीय दबाव नहीं बना पाईं, जबकि बंगाल की घटनाएं तुरंत राजनीतिक प्रतीक बन गईं. यह असमानता सिर्फ मीडिया की नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति की भी है.
मीडिया की भूमिका भी इस पूरी तस्वीर का अहम हिस्सा है. बड़े कॉरपोरेट स्वामित्व, विज्ञापन आधारित मॉडल और सत्ता तक पहुंच बनाए रखने की मजबूरी, ये सभी कारक तय करते हैं कि कौन-सा मुद्दा कितनी जगह पाएगा. रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी ग्रुप जैसे बड़े समूहों की मौजूदगी के बीच editorial स्वतंत्रता एक जटिल संतुलन बन जाती है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स जैसी संस्थाओं की रैंकिंग में भारत की स्थिति पर बहस भले हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र भी नहीं और पूरी तरह नियंत्रित भी नहीं, यह एक संघर्ष का क्षेत्र है, जहां सत्ता, पूंजी और पत्रकारिता लगातार टकराते रहते हैं.
इस चुनाव ने एक और मिथ तोड़ा कि सिर्फ पहचान की राजनीति, बंगाली अस्मिता या सड़क पर आक्रामक विरोध ही सत्ता बनाए रखने के लिए काफी है. जब जनता को रोजगार, सुरक्षा और पारदर्शी शासन नहीं मिलता, तो वह narrative से आगे बढ़कर परिणाम देखती है. सुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने इस असंतोष को संगठित राजनीतिक चुनौती में बदल दिया और देश भर से इकट्ठा किए गए भाजपा के मजबूत कैडर ने उसे वोट में तब्दील कर दिया.
सबसे बड़ा संदेश साफ है, वोटर अब सिर्फ “किसके खिलाफ” नहीं, बल्कि “कौन बेहतर” के आधार पर निर्णय ले रहा है. महिलाओं की सुरक्षा हो, कानून-व्यवस्था हो या रोजगार, ये मुद्दे किसी एक राज्य या पार्टी तक सीमित नहीं हैं, लेकिन कौन इन्हें राष्ट्रीय विमर्श में बदल पाता है, वही राजनीतिक बढ़त हासिल करता है.
ममता बनर्जी की हार सिर्फ एक नेता की हार नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मॉडल की चुनौती है जो मानता था कि करिश्मा, विरोध और पहचान की राजनीति लंबे समय तक पर्याप्त रहेंगे. 2026 ने दिखा दिया, सत्ता बनाए रखने के लिए narrative नहीं, performance चाहिए. और साथ ही यह भी कि आज के भारत में चुनाव सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि दिमाग और स्क्रीन, दोनों जगह लड़े जाते हैं.
और अंत में यह कि मुसलमानों पर आश्रित राजनीतिक गुणा भाग हिंदुत्व की राजनीति के गुणा भाग से देश के ज्यादातर हिस्सों में कमतर ही साबित होता रहेगा, यह सबक हमारे राजनीतिक विमर्श के आकाश पर टंग चुका है फिर भी हममें से कुछ उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं!
Lagatar Media की यह टिप्पणी आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

Leave a Comment