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भोजशाला विवाद : CJI का एमपी सरकार को निर्देश, व्यवस्था करें...मुस्लिम पक्ष नमाज अदा कर सके

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे केवल अंतरिम व्यवस्था करार दिया, स्पष्ट किया कि इसे किसी भी पक्ष के अधिकारों या दावों पर अंतिम फैसला नहीं माना जायेगा. कोर्ट के अनुसार इस व्यवस्था का उद्देश्य मुकदमे के अंतिम निपटारे तक शांति और सौहार्द कायम रखना है.
 

NewDelhi : सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर सुनवाई के क्रम में अहम आदेश जारी किया. सीजेआई सूर्यकांत ने मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम(Ad Hoc) व्यवस्था के तहत मुस्लिम पक्ष को जुमे की नमाज अदा करने के लिए भोजशाला परिसर से सटी खुली जगह उपलब्ध कराने का आदेश दिया.

 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे केवल अंतरिम व्यवस्था करार दिया, स्पष्ट किया कि इसे किसी भी पक्ष के अधिकारों या दावों पर अंतिम फैसला नहीं माना जायेगा. कोर्ट के अनुसार इस व्यवस्था का उद्देश्य मुकदमे के अंतिम निपटारे तक शांति और सौहार्द कायम रखना है.

 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश देते हुए कहा, वह ऐसी अंतरिम व्यवस्था बनाये, जिससे कोई भी पक्ष प्रभावित न हो. मुस्लिम पक्ष पहले की तरह नमाज अदा कर पाये.


 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में आज मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई, जिसमें भोजशाला को मां सरस्वती को समर्पित मंदिर माना गया था. बता दें कि हिंदू पक्ष शुरू से  दावा करता रहा है कि भोजशाला मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर है. उधर मुस्लिम पक्ष के अनुसार यह कमाल मौला मस्जिद है.

 

आज सुनवाई के क्रम में मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ैफा अहमदी ने दलील दी कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकार प्रभावित हुए हैं. कहा कि मुस्लिम पक्ष वहां नमाज पढ़ता रहा है.

 

वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ.अभिषेक मनु सिंघवी ने मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा कि यह संभव है कि कुछ स्थानों पर कभी मंदिर रहे हों, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर इतिहास को पलटना उचित नहीं होगा.  

 

सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों को सुन कर इसे अत्यंत संवेदनशील मामला करार दिया. सलाह दी कि दलील देते समय शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करे. साथ ही सीजेआई सूर्यकांत की पीठ बेंच ने कहा कि इस मामले की अंतिम सुनवाई उस दिन तय करेंगे, जब दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों के पास पर्याप्त समय होगा.  

 

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