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बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट निस्तारण केस: हाईकोर्ट ने जारी की विस्तृत गाइडलाइन

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में बायो-मेडिकल वेस्ट (चिकित्सीय अपशिष्ट) के वैज्ञानिक प्रबंधन को लेकर सख्त निर्देश जारी किया है. वर्ष 2012 से लंबित जनहित याचिका का निष्पादित कर दिया. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने माना है कि बायो-मेडिकल वेस्ट में संक्रमण फैलाने वाले तत्व होते हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर सकते हैं. 

 

कोर्ट ने कहा कि बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम, 1998 के स्थान पर अब बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल, 2016 लागू हैं, जिनके तहत कचरे के उत्पादन से लेकर अंतिम निस्तारण तक “जन्म से मृत्यु तक की” जवाबदेही तय की गई है. अब राज्य में पर्याप्त वैधानिक ढांचा मौजूद है, इसलिए प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरणों की है. खंडपीठ ने दोहराया कि स्वच्छ पर्यावरण और प्रदूषण मुक्त हवा-पानी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है.

 

 14 साल के कोर्ट के निगरानी से हुई प्रगति


खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 2012 में जब इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में शुरू हुई थी. तब रांची, धनबाद और जमशेदपुर में बायो-मेडिकल कचरे के निपटान में गंभीर खामियां पाई गई थीं. कई जगह संक्रमित सुईयां और मेडिकल कचरा सड़कों व नालियों में खुले में पड़ा मिला था. लगातार निगरानी के बाद अब राज्य में छह कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (CBWTF) रामगढ़, लोहरदगा, धनबाद, पाकुड़ और देवघर में संचालित हो रही हैं, जबकि गिरिडीह में एक नई इकाई निर्माणाधीन है. कोर्ट ने इसे सकारात्मक प्रगति बताया.

 

कोर्ट का दिशा निर्देश 


खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को कई अहम निर्देश दिए हैं. राज्य सरकार 30 दिनों के भीतर सचिव स्तर के अधिकारी को स्टेट नोडल ऑफिसर नियुक्त करने को कहा है. झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) सभी स्वास्थ्य संस्थानों और अधिकृत ट्रीटमेंट सुविधाओं की जिला-वार सूची तैयार करने को कहा है. 


प्रत्येक अस्पताल के पास वैध प्राधिकरण और अधिकृत ट्रीटमेंट सुविधा से जुड़ाव अनिवार्य होना चाहिए. बायो-मेडिकल कचरे की बार-कोडिंग और डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू की जाए. जिला स्तर पर निगरानी समितियों को 60 दिनों के भीतर सक्रिय किया जाए. 

 

नियमों के उल्लंघन पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत कार्रवाई, जुर्माना या अभियोजन किया जाए. 30 से अधिक बेड वाले अस्पतालों में बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी गठित करना अनिवार्य होगा.

 

कोर्ट की टिप्पणी


खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निगरानी इसलिए जरूरी हुई क्योंकि प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय तक लापरवाही रही. हालांकि अब संस्थागत ढांचा मजबूत हुआ है, इसलिए लगातार न्यायिक पर्यवेक्षण आवश्यक नहीं है. कोर्ट ने कहा कि भविष्य में यदि नियमों का उल्लंघन होता है तो प्रभावित व्यक्ति कानून के अनुसार उपाय कर सकते हैं.

 

दरअसल  यह जनहित याचिका झारखंड ह्यूमन राइट्स कॉन्फ्रेंस की ओर से दायर की गई थी, जिसमें राज्यभर के अस्पतालों व स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा बायो-मेडिकल कचरे के सुरक्षित निपटान को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी. 

 

याचिका में आरोप लगाया गया था कि अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित और खतरनाक कचरा खुले में फेंका जा रहा है, जिससे आमजन के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर खतरा है.

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