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चाईबासा : शहीद पार्क में छुपे हैं कई इतिहास, हो विद्रोहियों को अंग्रेजों ने किया था गोलियों से छलनी

Chaibasa (Sukesh kumar) :  कोल्हान प्रमंडल मुख्यालय चाईबासा में निर्मित शहीद पार्क के इतिहास पर कोई गौर नहीं करता. किसी के मन में कोई कौतूहल नहीं कि आखिर किन शहीदों के याद में शहीद पार्क को बनावाया गया  है और शहीद पार्क को किसने बनवाया. तो आईए शहीद पार्क चाईबासा की वृतांत को समझें और उन वीर शहीदों की इतिहास को जाने. जिन वीर शहीदों ने कोल्हान के जल, जंगल, जमीन की रक्षा करने के लिए अपनी जान की आहुति दे दी. शहीद पार्क चाईबासा का निर्माण अंग्रेजों ने वीर ‘हो’ विद्रोहियों के याद में की थी. इसे भी पढ़ें :सरायकेला">https://lagatar.in/seraikela-transit-plots-disappearing-due-to-encroachment-animals-looking-for-green-grass-on-paved-roads/">सरायकेला

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ब्रिटिश हुकूमत के तत्कालीन बिहार गवर्नर सर मॉरिस गार्नियर ने पार्क का किया था उद्घाटन

शहीद पार्क का उद्घाटन छह अक्टूबर 1937 को ब्रिटिश हुकूमत के तत्कालीन बिहार गवर्नर सर मॉरिस गार्नियर हैलेट ने किया था. ब्रिटिश हुकूमत ने कोल्हान के वीर शहीद हो विद्रोहियों के याद में चाईबासा के उसी स्थल पर शहीद पार्क का निर्माण करवाया. जहां ‘हो’ विद्रोहियों को रफसेज के आदेश पर अंग्रेजी सेना ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. बंगाल की दीवानी प्राप्त करने के बाद अंग्रेज जब साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे. तब उसी क्रम में कोल्हान पर अपना आधिपत्य जमाने के लिये जनरल रफसेज के नेतृत्व में अंग्रेजों ने कदम बढ़ाया और कई मौजा में जाकर मानकी मुंडा को पगड़ी पहनाया. इसी क्रम में 25 मार्च 1820 को कोल्हान के वीर हो विद्रोहियों ने रफसेज के खिलाफ विद्रोह कर दिया था. इसे भी पढ़ें :जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-15-lakh-stolen-by-breaking-the-lock-of-the-locked-house-of-tata-steel-worker-in-kadma/">जमशेदपुर

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सबसे पहले नरसंडा गांव के पास घास काटने वाले दो अंग्रेजों को हो विद्रोहियों ने मारा

सबसे पहले नरसंडा गांव के पास घोड़ा को घास खिलाने के लिए घास काटने वाले दो व्यक्ति को अंग्रेजों ने रखा था. जिसे हो विद्रोहियों ने मार डाला. इसके बाद घोड़े को भी मार डाला गया. इसके बाद अंग्रेज अपनी सेना की टुकड़ी के साथ नरसंडा गांव की ओर आगे बढ़े तो पहले से तैनात हो विद्रोहियों के बीच भीषण लड़ाई हुई. इसमें अंग्रेजी सेना के हाथ में आधुनिक हथियार था. जबकि हो विद्रोहियों के हाथ में पारंपरिक तीर धनुष. इस लड़ाई में लगभग 130 हो विद्रोहियों ने शहादत  दी थी. इस लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना ने कई गांव में जाकर मानकी मुंडा से संपर्क किया. इसके बाद लेफ्टिनेंट राफसेज अपनी सेना के साथ पुलिस लाइन के पास अपनी कैंप कार्यालय में लौट गए.  अंग्रेजों और हो विद्रोहियों के बीच हुई भीषण लड़ाई की चर्चा आसपास के गांव में जोर-शोर से होने लगी और कोल्हान के ग्रामीणों में गुस्सा फूटने लगा. तब चाईबासा के आसपास के ग्रामीण अपनी पारंपरिक हथियार के साथ एकत्रित हो गए और चारों ओर से आकर हो विद्रोही रफसेज का घेराव करने के लिए आगे बढ़ने लगे. रफसेज के अधिकारियों को जब यह सूचना मिली तो वे देखकर दंग रह गए. तब रफसेज ने कहा कि इन हो विद्रोहियों की इतनी दुस्साहस, सैकड़ों हो विद्रोहियों को निर्ममता पूर्वक कुचल देने के बाद भी वो नहीं डरा. इसे भी पढ़ें :किरीबुरु">https://lagatar.in/kiriburu-first-meeting-of-jharkhand-group-of-mines-held-at-ispat-bhawan-bokaro/">किरीबुरु

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शहीद पार्क में 50 हो विद्रोहियों को अंग्रेजों ने गोली मार दी थी

रफसेज ने अपने सेनापति को आदेश दिया की घेराव करने के लिए आने वाले हो विद्रोहियों पर गोली चला दो. तब ठीक शहीद पार्क चाईबासा के उसी परिसर में 50 हो विद्रोहियों को अंग्रेजों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. जबकि इसी दिन गुटियालोर में भी अंग्रेजी सेना और हो विद्रोहियों के बीच लड़ाई हुई थी. इसमें करीब 22 हो विद्रोहियों ने शहादत दिया था. इस प्रकार कोल्हान की खूंटकटी जल, जंगल, जमीन यानी भू संपदा की रक्षा करने के लिए हो विद्रोहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू किया. जो 17 वर्ष तक जारी रहा. यानी 1820 से 1837 तक हो विद्रोहियों ने अंग्रेजी अधिपत्य के खिलाफ संघर्ष करते रहा. इसे भी पढ़ें :जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-15-lakh-stolen-by-breaking-the-lock-of-the-locked-house-of-tata-steel-worker-in-kadma/">जमशेदपुर

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युवा पीढ़ी को इतिहास जानना चाहिए 

शहीद पार्क के इतिहास को भुलाने का प्रयास किया जा रहा है. जो बिल्कूल गलत है. वर्तमान युवा पीढ़ी को आगे आकर इतिहास को जानना चाहिये. यहां 50 हो विद्रोहियों को अंग्रेजी हुकुमत ने गोलियों से मारा था. इसके याद में शहीद पार्क बना है. [wpse_comments_template]  

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