Search

 
 
 

Chandil : आधुनिकता में गुम हो रही पौराणिक परंपरा, दीया बाजार में बढ़ी प्रतिस्पर्धा

 
Chandil (Dilip Kumar) : दीपोत्सव का महापर्व दीपावली पर मिट्टी के दीयों का विशेष महत्व रहता है. दीपावली के अवसर पर घरों को रौशन करने के लिए मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं. पूजा-पाठ व अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए मिट्टी के दीये महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. दीपावली के मौके पर परंपरागत दीयों के अलावा आधुनिक डिजाइनर दीयों की मांग हो रही है, लेकिन अधिकांश लोग परंपरागत दीये ही खरीद रहे हैं. आधुनिक युग में जिस प्रकार आधुनिक डिजाइनर दीये बाजार में पहुंच रहे हैं और बाजार में छाने लगे है इससे बाजार में बनें रहने के लिए परंपरागत मिट्टी के दीयाें को कड़ी टक्कर मिल रही है. वैसे कहा जाता है कि परिवर्तन की प्रक्रिया परंपरा का ही हिस्सा है, जो आधुनिकता को जन्म देती है. इसे भी पढ़ें : बिहार">https://lagatar.in/bihar-administration-made-tight-security-arrangements-on-diwali-medical-and-electricity-departments-are-also-alert/">बिहार

: दीपावली पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, चिकित्सा और बिजली विभाग भी चौकस

दाना ने डाला खलल

दीया बनाने के दौरान चक्रवाती तूफान दाना ने कुम्हारों के चाक की गति को धीमी कर दिया था. तूफान के कारण कुम्हारों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. दीये ठीक से सूख नहीं पाए और खराब मौसम के कारण कुम्हार प्रर्याप्त मात्रा में दीया नहीं बना सके. बाजार में मिट्टी से बने दीये और खिलौनों की मांग घटी नहीं है. बाजार में परंपरागत मिट्टी के दीया कम पड़ने लगे हैं. चांडिल बाजार, चौका मोड़, रघुनाथपुर, ईचागढ़, टीकर, तिरुलडीह, कुकडू, झिमड़ी आदरडीह समेत अन्य स्थानाें में लगे दीया बाजार में खरीदारों की भीड़ उमड़ रही है. ग्रामांचलों में दीपावली के अवसर पर लोग अपने घरों को परंपरागत मिट्टी के दीयों से ही रोशन करते हैं. [wpse_comments_template]
Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही