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चांडिल : प्रकृति प्रेम को दर्शाता है बाहा बोंगा, अनुमंडल क्षेत्र में बिखरने लगी खुशबू

Chandil (Dilip Kumar) : पर्व-त्योहारों के ताना-बाना से सुवासित झारखंडी आदिवासियों के जीवन चक्र में और एक पर्व आ गया बाहा बोंगा. इस पर्व के नाम मात्र से प्रकृति प्रेमी, नैसर्गिक गुणों के धनी और पर्यावरण के स्वभाविक रक्षक आदिवासियों का मन रोमांचित हो उठता है. फाल्गुनी रंगों से सजा-संवरा प्रकृति में सखुआ के पेड़ फूलों से लद गए. साथ ही पलाश के पौधे फूलों से लदककर पूरे धरा को गेरुए रंग से रंगने को उतावली होने लगी है और महुआ के फूल की सुंगध वातावरण में मादकता घोलने लगी है. उन फूलों की भीनी-भीनी महक सारे वातावरण को सुरभित कर पर्व के आगमन का संकेत देती है. इसके साथ बाहा बोंगा का आगाज होता है. चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के विभिन्न स्थानों में बाहा बोंगा धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है. वैसे फाल्गुल माह में चांद दिखाई देने के पांचवें दिन से बाहा पर्व मनाने की परंपरा है. इसे भी पढ़े : धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-due-to-the-sound-of-bird-flu-trouble-on-the-chicken-business/">धनबाद

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बाहा में साल व महुआ के फूल का है विशेष महत्व

जब प्रकृति फूलों और वृक्षों के नए पत्तों से अपना श्रृंगार करती है तब संताल जनजाति बाहा पर्व मानते है. बाहा पर्व में सारजोम यानी साल और मातकोम यानी महुआ के फूल का विशेष महत्व है. पूजा के दौरान नायके यानी पुजारी जाहेरथान में दोनों फूलों से पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा-अर्चना के बाद सभी को साल का फूल प्रसाद स्वरूप दिया जाता है. जिसे पुरुष अपने कान में और महिलाएं अपनी जुड़े में लगाती हैं. पुजारी पूजा-अर्चना के बाद घर-घर जाकर लोगों को साल का फूल देते हैं. साल का फूल मिलने के बाद जाहेरथान के आखड़ा में पारंपरिक वाद्य यंत्राें के साथ बाहा नृत्य किया जाता है. समाज के लोग अपने पारंपरिक परिधान में एक साथ कतारबद्ध होकर बाहा नृत्य करते हैं. इससे उनकी एकता बनी रहती है और सभी मिलकर समाज में सुख-समृद्धि के लिए कामना करते हैं. इसे भी पढ़े : छत्तीसगढ़">https://lagatar.in/chhattisgarh-one-jawan-martyred-by-naxalites-ied-blast-7-jawans-lost-their-lives-in-a-week/">छत्तीसगढ़

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तीन दिनों का पर्व है बाहा

संताल आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला बाहा बोंगा तीन दिनों का त्योहार है. बाहा के पहले दिन जाहेरथान में छावनी बनाया जाता है, जिसे (उम नाड़का) जाहेर साड़िम दालोप कहते हैं. वहीं दूसरे दिन बाहा सारदी पर गांव के लोग अपने नायके को उसके घर से नाचते-गाते जाहेरथान तक ले जाते हैं. जाहेरथान में नायके बोंगा दारी यानी पूजे जाने वाले साल के पेड़ के नीचे गोबर पानी देकर शुद्धिकरण करते हैं. इसके बाद सिंदूर का टीका लगाकर साल व महुआ के फूल से इष्टदेवों की पूजा की जाती है.इस दौरान इष्टदेवों के नाम पर बलि भी दी जाती है. इससे सोड़े यानी खिचड़ी प्रसाद बनाया जाता है. इस प्रसाद को समाज के पुरुष ही ग्रहण करते हैं. इसी दिन नाच गान का कार्यक्रम होता है.

आखिरी दिन खेली जाती है पानी की होली

बाहा बोंगा के तीसरे व आखिरी दिन बाहा सेंदरा किया जाता है. सेंदरा से लौटने के बाद गांव में होली खेली जाती है. होली भी अनोखा, जिस प्रकार लोग अलग-अलग रंगों से होली खेलते है वैसा संताल समाज में नहीं है. संताल समाज में स्वच्छ पानी से होली खेली जाती है. एक दूसरे पर पानी डालकर बाहा की खुशियां मनाई जाती है. बाहा पर्व के बाद से ही संताल समाज के लोग नए पत्तें और फूलों का उपयोग करते हैं. इस पर्व में कुवांरी कन्याओं का भी सम्मान किया जाता है. पूजा-अर्चना के बाद नायके पहले कुवांरी कन्याओं का ही साल का फूल देते हैं. इसके बाद अन्य लोगों का सुख-समृद्धि का प्रतीक बाहा फूल दिया जाता है. [wpse_comments_template]

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