Chandil (Dilip Kumar) : झारखंड एक अनोखा प्रदेश है. यहां की रीति-रिवाज, परंपरा, प्रकृति के साथ लोगों का जुड़ाव काफी रोचक है. यहां के आदिवासी-मूलवासी समाज हर काम से पहले प्रकृति से इजाजत लेते हैं. यहां कृषि कार्य से जुड़ी कई परंपराएं प्रचलित है . धान की खेती के हर पड़ाव में झारखंड के आदिवासी किसान अलग-अलग रूप में अपने आराध्यदेव की पूजा-अर्चना करते हैं. धान की खेती करने के पहले खेत में हल जोतने से लेकर खेत से धान काटकर खलिहान तक ले जाने और फिर नया अन्न खाने के वक्त भी पूजा-अर्चना की जाती है. इन्हीं परंपराओं में से एक है आषाढ़ी पूजा. क्षेत्र के अलग-अलग गांवों में आषाढ़ी पूजा करने का सिलसिला शुरू हो चुका है. लोग पूरे विधि-विधान के साथ अपने इष्टदेव की आराधना कर धान की बुआई शुरू करेंगे. इसे भी पढ़ें :सरायकेला-खरसावां">https://lagatar.in/seraikela-kharsawan-bahuda-rath-yatra-of-lord-jagannath-will-leave-today/">सरायकेला-खरसावां
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फसलों के निरोग और निर्बाध पनपने की कामना करते है किसान
दरअसल, आषाढ़ी पूजा प्रकृति के प्रकोप से फसल को बचाने, स्वस्थ पौधा पनपने, अच्छी वर्षा होने, कीट-पतंगों से फसल की रक्षा करने, किसी प्रकार की अनहोनी से बचाने, अच्छी पैदावार होने और सभी की कुशलता की कामना करने के लिए की जाती है. इस दौरान माझी बाबा जाहेरथान में इष्ट देव से फसलों के निरोग और निर्बाध पनपने की कामना करते हैं. इस अवसर पर मुर्गा, भेड़ या बोदा यानि बकरे की बलि दी जाती है. मान्यता है कि आषाढ़ी पूजा नहीं करने वालों का कृषि कार्य बाधित हो जाता है और उसपर विपत्ती आती है. इसलिए इस पर्व का आयोजन गांव-गांव में किया जाता है. इसे भी पढ़ें :झारखंड">https://lagatar.in/corona-spreading-again-in-jharkhand-132-new-patients-found-in-24-hours-58-became-healthy/">झारखंडमें फिर पांव पसार रहा कोरोना, 24 घंटे में मिले 132 नये मरीज, 58 हुए स्वस्थ
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