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वनों के संरक्षक रहे समुदाय हाशिए पर, पूंजीपतियों को मिल रहा लाभ

Pravin kumar

Ranchi: भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति 1952 में यह लक्ष्य रखा गया था कि देश के एक-तिहाई भूभाग पर वन क्षेत्र होना चाहिए, जबकि संविधान के अनुच्छेद 48(क) के तहत राज्य का दायित्व है कि वह पर्यावरण संरक्षण, वन एवं वन्य जीवों की रक्षा करे. लेकिन 75 वर्षों बाद भी भारत मात्र 21% वन क्षेत्र तक ही सिमट गया है, जो नीति के लक्ष्य से बहुत पीछे है.

 

जलवायु संकट और वैश्विक चेतावनी


2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत अब ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में तीसरे स्थान पर है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि तापमान वृद्धि को रोका नहीं गया तो आने वाले समय में धरती पर जीवन संकट में पड़ जाएगा. पिछले 103 वर्षों में धरती का औसत तापमान 1.4°C तक बढ़ चुका है.

 

आदिवासी क्षेत्रों में सुरक्षित हैं जंगल


आंकड़े बताते हैं कि जहां एक ओर देश में वनों का क्षरण हुआ, वहीं अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों ने 30% जंगलों की रक्षा की है. छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में तो 76% जंगल संरक्षित हैं. बावजूद इसके  इन समुदायों को औपचारिक रूप से किसी प्रकार का ग्रीन क्रेडिट लाभ नहीं मिल रहा.

 

ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम: उद्देश्य और असल तस्वीर


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में UNFCCC के COP-26 सम्मेलन में LiFE मिशन के तहत ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP) की शुरुआत की थी.
यह कार्यक्रम बाजार आधारित तंत्र है, जिसका उद्देश्य वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सतत कृषि, अपशिष्ट प्रबंधन, वायु प्रदूषण नियंत्रण और मैन्ग्रोव संरक्षण जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देना है.

परंतु  इस योजना का लाभ उन्हीं को मिलेगा जो वृक्षारोपण करेंगे और वैज्ञानिक आकलन से गुजरेंगे - यानी पूंजीपतियों, कॉर्पोरेट घरानों और बड़े संस्थानों को. जबकि जो समुदाय पीढ़ियों से इन वनों की रक्षा करते आ रहे हैं, वे इस योजना से बाहर हैं.

 

ग्रीन क्रेडिट: परंपरागत वन रक्षकों के साथ अन्याय


यह नैतिक और नीतिगत विफलता है कि जिन आदिवासियों ने जंगलों को बचाया, उन्हें क्रेडिट नहीं दिया जा रहा. इसके उलट  जिनके कारण 3 लाख हेक्टेयर से अधिक जंगलों का गैर-वन परियोजनाओं के लिए उपयोग हुआ (2008 के बाद), वहीं मंत्रालय अब पर्यावरण संरक्षण का ठेका ले रहे हैं.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने अब तक 64,801 आदिवासी परिवारों को विस्थापित कर दिया है. यह वही मंत्रालय है, जो अब ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम का संचालन कर रहा है.

 

क्या ग्रीन क्रेडिट वास्तव में "ग्रीन" है?


इस कार्यक्रम से यह सवाल उठता है कि क्या यह पहल वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के लिए है, या फिर कॉर्पोरेट लाभ के लिए एक नया रास्ता? क्या यह योजना "हरियाली के नाम पर विस्थापन" का नया यंत्र बन कर उभर रहा है?

 

आखिरी लड़ाई: आदिवासियों की लोकतांत्रिक पुकार: जेम्स हेरेंज 


पूरे मामले पर सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स कहते हैं, अब जब संस्थागत अन्याय चरम पर है, तब आदिवासी समुदायों के सामने एक ही रास्ता बचता है - लोकतांत्रिक ढंग से संघर्ष जारी रखना. सृष्टि को बचाने की इस अंतिम लड़ाई में आदिवासी ही सबसे मजबूत मोर्चा हैं. उन्हें अपने अधिकार, अपने जंगल और अपने भविष्य के लिए संगठित होकर खड़ा होना होगा.

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