Ranchi: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए हो रहे चुनाव में इस बार मुकाबला केवल दो सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों, गठबंधन की मजबूती और दलों के भीतर की स्थिति का भी माना जा रहा है. चुनावी मैदान में तीन प्रमुख उम्मीदवार हैं—एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी, झामुमो के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा. राजनीतिक हलकों में चर्चा यह है कि परिमल नाथवानी और बैजनाथ राम की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दे रही है, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को अपने ही गठबंधन और पार्टी के भीतर पैदा हुई असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.
राज्यसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद से ही कांग्रेस संगठन लगातार सक्रिय है. विधायक दल के नेता प्रदीप यादव पार्टी विधायकों के संपर्क में हैं और कांग्रेस नेतृत्व की पूरी कोशिश है कि मतदान के दौरान कोई भी विधायक पार्टी लाइन से अलग न जाए. राज्यसभा चुनाव को लेकर झारखंड कांग्रेस की बढ़ती बेचैनी अब दिल्ली तक महसूस की जा रही है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसी कारण प्रदेश प्रभारी के. राजू और वरिष्ठ नेता अजय शर्मा को तत्काल रांची भेजा गया. सोमवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनके आवास पर के. राजू, सांसद सैयद नसीर हुसैन, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और अजय शर्मा की मुलाकात ने सियासी अटकलों को और तेज कर दिया. कांग्रेस नेतृत्व को चिंता है कि यदि मतदान के दौरान क्रॉस वोटिंग हुई या सहयोगी दलों का रुख बदला, तो इसका असर केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले गठबंधन की एकजुटता और कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है.
इसी बीच कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा ने समर्थन जुटाने के लिए सहयोगी दलों से संपर्क अभियान तेज कर दिया है. रांची का सियासी माहौल उस समय और गर्म हो गया जब प्रणव झा अपने समर्थकों और नेताओं के साथ भाकपा माले के राज्य कार्यालय पहुंचे. उस समय वहां माले की राज्य इकाई की बैठक चल रही थी, जिसमें पार्टी के केंद्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, विधायक अरूप चटर्जी, विनोद सिंह समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे.
बैठक के बाद प्रणव झा ने माले का आभार जताते हुए कहा कि यह गठबंधन केवल सीटों का समीकरण नहीं है, बल्कि जनता की आवाज, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का साझा मंच है. उन्होंने सहयोगी दलों के समर्थन को महत्वपूर्ण बताते हुए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की.
हालांकि उसी मंच से माले के केंद्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने भाजपा और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा विपक्ष को समाप्त कर "वन नेशन-वन इलेक्शन" की अवधारणा के माध्यम से "वन नेशन-वन पार्टी" की राजनीति लागू करना चाहती है. दीपांकर ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि कोलकाता में हजारों ईवीएम मशीनों में आग लगने की घटना पर पर्याप्त जवाब क्यों नहीं दिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राज्यों में विपक्षी उम्मीदवारों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिशें हुई हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
लेकिन राज्यसभा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा गठबंधन के भीतर दिखाई दे रही राजनीतिक दूरी की हो रही है. विधानसभा परिसर में जब कांग्रेस के मंत्री और नेता परिमल नाथवानी के नामांकन को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, तब उनके सहयोगी दलों की मौजूदगी लगभग नदारद रही. न झामुमो के नेता उस विरोध में सक्रिय दिखे, न राजद और न ही माले के कार्यकर्ता वहां नजर आए. कांग्रेस नेताओं ने विधानसभा प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगाए, लेकिन सहयोगी दलों की चुप्पी ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के भीतर चल रही यह अंतर्धारा अब सतह पर दिखाई देने लगी है. सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन धर्म निभाने की बात कर रहे हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनके रुख में अंतर भी साफ दिखाई दे रहा है.
उधर भाजपा इन सभी अटकलों को कांग्रेस की आंतरिक समस्या बता रही है. भाजपा नेता दीपक प्रकाश ने राज्यसभा चुनाव में खरीद-फरोख्त की चर्चाओं को पूरी तरह खारिज किया है. उन्होंने कहा कि 2020 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के पास केवल 25 विधायक थे, लेकिन पार्टी को 31 वोट मिले थे, जबकि शिबू सोरेन को 30 वोट प्राप्त हुए थे. दीपक प्रकाश ने दावा किया कि उस चुनाव में समर्थन देने वाले किसी भी विधायक ने कोई आर्थिक लाभ नहीं लिया था और समर्थन पूरी तरह राजनीतिक विश्वास के आधार पर मिला था.
उन्होंने यह भी कहा कि इस बार एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी और झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम की जीत लगभग तय मानी जा रही है. भाजपा का तर्क है कि दोनों उम्मीदवार अनुभवी, स्वीकार्य और राजनीतिक रूप से परखे हुए चेहरे हैं. वहीं कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को लेकर उन्होंने दावा किया कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी और गठबंधन के भीतर मौजूद असहजता है.
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी लगातार तेज हो रही है कि क्या मतदान के दौरान क्रॉस वोटिंग कोई भूमिका निभा सकती है. झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव पहले भी कई अप्रत्याशित घटनाओं और क्रॉस वोटिंग के आरोपों के कारण चर्चा में रहे हैं. हालांकि सभी दल अपने विधायकों की एकजुटता का दावा कर रहे हैं, लेकिन चुनावी माहौल में चल रही बैठकों, संपर्क अभियानों और राजनीतिक बयानबाजी ने उत्सुकता बढ़ा दी है.
इस चुनाव का महत्व केवल राज्यसभा की दो सीटों तक सीमित नहीं माना जा रहा है. कई राजनीतिक जानकार इसे 2029 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की मजबूती, संगठन की पकड़ और विधायकों पर नेतृत्व के प्रभाव की परीक्षा के रूप में भी देख रहे हैं. यही कारण है कि दो सीटों और तीन उम्मीदवारों के इस मुकाबले ने झारखंड की राजनीति को असाधारण रूप से रोचक बना दिया है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपने विधायकों और सहयोगी दलों को पूरी तरह एकजुट रख पाएगी, या फिर राजनीतिक गलियारों में चल रही असहमति की चर्चाएं मतदान के दिन किसी बड़े संकेत में बदल जाएंगी. दूसरी ओर परिमल नाथवानी और बैजनाथ राम को लेकर जिस तरह की राजनीतिक सहमति दिखाई दे रही है, उसने चुनाव परिणामों को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है. मतदान और परिणाम के साथ इन तमाम सवालों के जवाब सामने आएंगे, लेकिन फिलहाल झारखंड की राजनीति का केंद्र राज्यसभा चुनाव ही बना हुआ है.
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