- हाईकोर्ट ने दिया 12 सप्ताह में आदेश जारी करने का निर्देश
- मलेरिया इंस्पेक्टर के समान वेतनमान मिलेगा
- मृत कर्मचारी के आश्रित को भी मिलेगा लाभ
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने मलेरिया और कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 14 से 18 वर्षों से अनुबंध पर कार्यरत मलेरिया टेक्निकल सुपरवाइजर (एमटीएस) और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजर (केटीएस) को बड़ी राहत दी है. जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने इन कर्मचारियों की सेवा नियमित करने का आदेश दिया है. अदालत ने राज्य सरकार को एमटीएस और केटीएस के नियमित पद सृजित कर याचिकाकर्ताओं की प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से सेवा नियमित करने का निर्देश दिया है. उन्हें मलेरिया इंस्पेक्टर के समान वेतनमान देने को कहा गया है.
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि में एमटीएस और केटीएस के नियमित पद सृजित नहीं किए जाते हैं, तो याचिकाकर्ताओं को मलेरिया इंस्पेक्टर के स्वीकृत रिक्त पदों पर नियमित रूप से समायोजित किया जाए. पूरी प्रक्रिया 12 सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया है.
अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से इन कर्मचारियों की सेवा नियमित करने की मांग खारिज कर दी गई थी. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने पक्ष रखा. अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का रवैया मनमाना है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार के विपरीत है.
नियमित पद नहीं होने का तर्क स्वीकार नहीं
याचिकाकर्ताओं अमृता कुमारी एवं अन्य की ओर से अदालत को बताया गया कि सभी कर्मचारियों की नियुक्ति विज्ञापन के माध्यम से निर्धारित योग्यता के आधार पर की गई थी. वे वर्ष 2008 से 2012 के बीच अलग-अलग तिथियों पर नियुक्त हुए थे और लगातार मलेरिया एवं कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनके अनुबंध का हर वर्ष नवीकरण किया जाता रहा है.
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनके अधीन कार्य करने वाले मल्टीपर्पज वर्कर (पुरुष) यानी एमपीडब्ल्यू की सेवा के लिए राज्य सरकार ने नियमित वेतनमान में पद सृजित किए, लेकिन पर्यवेक्षकों के मामले में ऐसा नहीं किया गया. जबकि दोनों की नियुक्ति एक ही कार्यक्रम के तहत हुई थी और काम की प्रकृति भी स्थायी है.
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राज्य सरकार ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अस्थायी और अनुबंध के आधार पर हुई थी. उनका मानदेय केंद्र सरकार से मिलने वाली राशि से दिया जाता है और स्वास्थ्य विभाग में उनके लिए नियमित स्वीकृत पद उपलब्ध नहीं हैं. नियुक्ति पत्रों में भी स्पष्ट था कि उनकी नियुक्ति अस्थायी होगी और नियमित नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा.
सरकार के पूर्व आश्वासन को भी अदालत ने माना महत्वपूर्ण
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इससे पहले भी याचिकाकर्ताओं ने सेवा नियमित करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. वर्ष 2018 में राज्य सरकार ने अदालत में हलफनामा देकर कहा था कि एमटीएस और केटीएस की सेवा एमपीडब्ल्यू के समान नियमित करने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है. इस मामले में विधि, कार्मिक और वित्त विभाग से परामर्श लेकर निर्णय लेने की बात कही गई थी.
इसी आश्वासन के आधार पर हाईकोर्ट ने 10 सितंबर 2018 को मामले का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया था. बाद में राज्य सरकार की अपील देरी के आधार पर खारिज हो गई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 21 फरवरी 2025 को राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं के मामले पर गुण-दोष के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया था.
हालांकि राज्य सरकार ने 28 अप्रैल 2025 को आदेश जारी कर उनकी मांग खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने पाया कि इस आदेश में न तो संबंधित विभागों से परामर्श किए जाने का उल्लेख था और न ही मलेरिया इंस्पेक्टर के रिक्त पदों पर समायोजन के वैकल्पिक दावे पर विचार किया गया था.
14 से 18 साल की सेवा को नजरअंदाज नहीं कर सकती सरकार
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने एमपीडब्ल्यू के लिए नियमित पद सृजित कर यह स्वीकार किया था कि मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम का काम स्थायी प्रकृति का है. ऐसे में उसी कार्यक्रम के तहत काम करने वाले पर्यवेक्षकों के साथ अलग व्यवहार करने का कोई उचित कारण नहीं बताया गया.
अदालत ने कहा कि कर्मचारियों के अनुबंध का लगातार 14 से 18 वर्षों तक नवीकरण होना इस बात का प्रमाण है कि उनके काम की आवश्यकता बनी हुई है. केवल अनुबंध पर नियुक्ति होने या नियमित पद उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती.
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति विज्ञापन के माध्यम से हुई थी और उन्होंने निर्धारित योग्यता के आधार पर लंबे समय तक काम किया है. ऐसे में उनकी नियुक्ति को पिछली तारीख से नियमित करने के दावे पर विचार करते समय कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना आवश्यक है.
प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से मिलेगा सेवा लाभ
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं की सेवा उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित मानी जाएगी. उन्हें वरिष्ठता और पेंशन संबंधी लाभों के लिए निरंतर सेवा का लाभ मिलेगा तथा प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से वेतन का काल्पनिक निर्धारण किया जाएगा. हालांकि वास्तविक आर्थिक लाभ फैसले की तारीख से देय होंगे.
मामले के मूल याचिकाकर्ता बीरेंद्र प्रसाद की 24 सितंबर 2025 को मृत्यु हो गई थी. अदालत ने निर्देश दिया है कि उनकी सेवा को भी संबंधित तिथि से नियमित माना जाए और इसके आधार पर मिलने वाले अंतिम भुगतान तथा अन्य देय लाभ उनकी विधिक उत्तराधिकारी पत्नी अमिता कुमारी को दिए जाएं.
अदालत ने राज्य सरकार को चेतावनी दी कि इस फैसले का निर्धारित समय में पालन नहीं होने पर मामले को गंभीरता से लिया जाएगा. याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने सभी संबंधित अधिकारियों को आवश्यक आदेश जारी कर 12 सप्ताह के भीतर पूरी प्रक्रिया संपन्न करने का निर्देश दिया.
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