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Court News: हजारीबाग में अवैध खनन पर HC की टिप्पणी- जनता के जीवन व पर्यावरण के अधिकार पर सीधा आघात

  • हजारीबाग जिला प्रशासन, खनन विभाग, पुलिस व झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपने वैधानिक दायित्व निभाने में विफल

Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग में अवैध पत्थर खनन, स्टोन क्रशर संचालन और प्रशासनिक विफलता पर कड़ी टिप्पणी की है. हजारीबाग जिले के सवानी नदी, तेपसा गांव और इचाक क्षेत्र में हो रहे अवैध खनन व स्टोन क्रशर संचालन पर रोक लगाते हुए हजारीबाग जिला प्रशासन, खनन विभाग, पुलिस व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 15 सख्त निर्देश दिए हैं.

 

कहा है कि यह केवल “प्रशासनिक लापरवाही” नहीं बल्कि जनता के जीवन और पर्यावरण के अधिकार पर सीधा आघात है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक व जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने इससे संबंधित याचिका पर फैसला सुनाया है.

 

पर्यावरण को लगातार नुकसान, अधिकारियों की लापरवाही

कोर्ट ने पाया कि अवैध गतिविधियों से खेती योग्य जमीन बर्बाद हो रही है, सवानी नदी का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है और लोगों की जान को खतरा है. हजारीबाग जिला प्रशासन ने एमएमडीआर एक्ट 1957 व पर्यावरण कानूनों का पालन नहीं किया. कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना और 'पॉल्यूटर पेज' सिद्धांत लागू किया.

 

अधिकारियों की मिलीभगत पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां केवल कागजी आश्वासन देती रहीं, जिम्मेदारी टालती रहीं और कार्रवाई से बचती रहीं. कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को यह भरोसा हो गया है कि ऐसी लापरवाही से न तो उनके वेतन, न पदोन्नति और न ही करियर पर कोई प्रभाव पड़ता है.

 

कोर्ट ने कहा कि हजारीबाग जिला प्रशासन, खनन विभाग, पुलिस और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपने वैधानिक दायित्व निभाने में विफल रहे हैं. केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है, जब तक वास्तविक अभियोजन और पर्यावरणीय कार्रवाई न हो.

 

15 सूत्री निर्देश किया जारी

कोर्ट ने मामले में सरकार को दिशा निर्देश जारी किए हैं. आदेश दिया कि हजारीबाग जिला स्तरीय टास्क फोर्स (DLTF) प्रत्येक माह बैठक करेगी और उसकी कार्यवाही वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी. टास्क फोर्स को सभी पर्यावरणीय स्वीकृतियों, विस्फोटक लाइसेंस, प्रदूषण नियंत्रण अनुमति और खनन लाइसेंस की समीक्षा करनी होगी.

 

जब तक सभी वैधानिक अनुमतियों की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि या स्टोन क्रशर संचालन पर रोक रहेगी. कोर्ट ने हजारीबाग वाइल्डलाइफ सेंच्युरी की सीमा से एक किलोमीटर के दायरे में खनन और स्टोन क्रशर संचालन पर प्रतिबंध दोहराया. तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था लागू करने का निर्देश देते हुए सीसीटीवी निगरानी, जीपीएस ट्रैकिंग और जियो-फेंसिंग प्रणाली लागू करने को कहा. साथ ही अवैध खनन की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और ईमेल शुरू करने का आदेश दिया गया.

 

कोर्ट ने जिला खनन पदाधिकारी को माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 1957 की धारा 21 और 22 के तहत अवैध खनन में शामिल लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने और अवैध रूप से निकाले गए खनिजों की कीमत वसूलने का निर्देश दिया. हजारीबाग पुलिस अधीक्षक को सभी अवैध खनन मामलों की समयबद्ध जांच कर चार्जशीट दाखिल करने को कहा है.

 

वहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पर्यावरण संरक्षण कानून, वायु अधिनियम और जल अधिनियम के तहत कार्रवाई कर अवैध इकाइयों को बंद कराने और बिजली काटने का निर्देश दिया गया. “Polluter Pays” सिद्धांत लागू करते हुए कोर्ट ने पर्यावरणीय क्षति के लिए मुआवजा लगाने का आदेश भी दिया.

 

साथ ही बंद और परित्यक्त खदानों को सुरक्षित कर पुनर्स्थापित करने के निर्देश दिए गए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आदेशों के पालन में कोई लापरवाही हुई तो संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माने जाएंगे और उनके विरुद्ध विधि अनुसार कार्रवाई की जाएगी.

 

अवैध खनन अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव नहीं 

खंडपीठ ने कहा कि लगातार हो रहे उल्लंघनों के बावजूद अधिकारियों की निष्क्रियता “सार्वजनिक कर्तव्य की स्पष्ट विफलता” है. कोर्ट ने यह भी माना कि इस प्रकार की बड़े पैमाने की अवैध खनन गतिविधियां अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव नहीं हैं. भारी मशीनरी, श्रमिकों और सार्वजनिक सड़कों पर परिवहन के बावजूद प्रशासन की चुप्पी गंभीर सवाल खड़े करती है.

 

याचिकाकर्ताओं द्वारा अधिकारियों पर “बाहरी लाभ” के लिए मिलीभगत के आरोपों का भी उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि उल्लंघनों की गंभीरता और प्रशासन की कमजोर प्रतिक्रिया को देखते हुए इन आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.

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