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राज्यसभा चुनाव में दलित कार्ड और विकास का दावा, नाथवानी बोले- आंकड़े नहीं, काम बोलेगा

Ranchi : झारखंड राज्यसभा चुनाव अब सिर्फ वोटों के जोड़-तोड़ तक सीमित नहीं रहा. एक तरफ झामुमो ने दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरा है, तो दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने गणित की बजाय अपने काम को ढाल बनाकर मैदान में उतरने का फैसला किया है.

 

विधानसभा में मीडिया को संबोधित करते हुए झामुमो के केंद्रीय सचिव और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने भाजपा पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि आज तक भाजपा ने कभी किसी दलित को झारखंड से राज्यसभा नहीं भेजा है. उन्होंने अपने प्रत्याशी बैद्यनाथ राम को स्थानीय और दलित उम्मीदवार बताते हुए कहा कि उनके जीतने पर पहली बार कोई दलित यहां से राज्यसभा पहुंचेगा.

 

भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार का नामांकन दाखिल करना और वोट मिलना दो अलग बातें हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि पहले यह तो तय हो कि भाजपा के अपने विधायक उनके उम्मीदवार के साथ खड़े भी हैं या नहीं. उन्होंने भाजपा को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें थोड़ी भी नैतिकता बची है तो उन्हें दलित हितों को देखते हुए बैद्यनाथ राम के पक्ष में मतदान करना चाहिए.

 

नाथवानी का जवाब - मुझे काम पर भरोसा

दूसरी तरफ नामांकन दाखिल करने के बाद मीडिया से बात करते हुए परिमल नाथवानी पूरे आत्मविश्वास में नजर आए. जब उनसे एनडीए के 24 विधायकों और जीत के लिए जरूरी 28 वोटों के बीच की 4 वोटों की कमी पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ कहा कि वे आंकड़ों की उलझन भरी राजनीति नहीं करते. उन्होंने कहा कि राजनीति सिर्फ जोड़-तोड़ का नाम नहीं है और उन्हें पूरा भरोसा है कि हर वर्ग और दल का सहयोग उन्हें मिलेगा.

 

नाथवानी ने झारखंड के साथ अपने पुराने जुड़ाव को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया. उन्होंने कहा कि पिछले दो कार्यकालों में उन्होंने राज्य में विश्वस्तरीय अस्पताल बनवाने से लेकर बुनियादी ढांचे और सामाजिक विकास में बड़ा योगदान दिया है. उन्होंने कहा कि अगर इस बार मौका मिला तो वे पिछले दोनों कार्यकालों से भी ज्यादा तेजी और लगन के साथ झारखंड के लिए काम करेंगे.  नाथवानी ने यह भी कहा कि उनके सभी दलों के नेताओं और जनप्रतिनिधियों के साथ अच्छे संबंध हैं.

 

अब देखना यह है कि चुनाव में दलित प्रतिनिधित्व का मुद्दा भारी पड़ता है या नाथवानी का काम का रिकॉर्ड. झारखंड की राजनीति में यह मुकाबला जितना संख्याओं का है, उतना ही भावनाओं और रणनीति का भी.

 

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