Ranchi News: झारखंड के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) में पिछले 10 वर्षों के दौरान हुए खर्च की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर राज्य के सभी 24 जिलों में करीब 6 हजार करोड़ के आवंटन और खर्च की जांच कराने का आग्रह किया है.
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बाबूलाल मरांडी ने धनबाद में सामने आए कथित गबन के मामले का भी पत्र में जिक्र किया है. उन्होंने कहा कि केंद्र से मिले 11 करोड़ से अधिक के फंड में करीब 6.97 करोड़ के गबन की बात सामने आई है. आरोप है कि इसमें से 4.16 करोड़ से ज्यादा की राशि ब्लॉक अकाउंट मैनेजर, उसके परिजनों और परिचितों के खातों में भेजी गई.
उन्होंने कहा कि मामले की जांच केवल संविदा कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. फंड के भुगतान और उसकी मंजूरी देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.
मरांडी ने पिछले 10 वर्षों में स्वास्थ्य विभाग और NHM के तहत मिले करीब ₹6,000 करोड़ के फंड की जांच सभी 24 जिलों में कराने की मांग की है. इसमें फंड के आवंटन, खर्च, दवा और उपकरणों की खरीद तथा उनकी वास्तविक आपूर्ति की जांच शामिल है.
उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर और IT प्रोजेक्ट की भी स्वतंत्र जांच की मांग की है. साथ ही CAG और महालेखाकार की आपत्तियों पर हुई कार्रवाई की समीक्षा करने को कहा है. विधानसभा में सरकार की ओर से दी गई वित्तीय जानकारी का भी मूल रिकॉर्ड से मिलान कराने की मांग की गई है.
बाबूलाल मरांडी ने पूरे मामले की जांच CBI या स्वतंत्र SIT से कराने की मांग की है. उन्होंने जांच को सक्षम न्यायालय की निगरानी में कराने का सुझाव भी दिया है. इसके अलावा बैंक खातों, खरीद से जुड़े दस्तावेज और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड का फोरेंसिक ऑडिट कराने की मांग की है.
उन्होंने सरकार से सभी बिल, वाउचर, बैंक स्टेटमेंट, टेंडर दस्तावेज, स्टॉक रजिस्टर और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा है. उनका कहना है कि जांच के दौरान रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की संभावना को रोकना जरूरी है.
मरांडी ने दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने तथा गबन की राशि की वसूली की मांग की है. उन्होंने जांच की समयसीमा तय कर उसकी रिपोर्ट विधानसभा के सामने रखने का भी आग्रह किया है.
उन्होंने कहा कि धनबाद में सामने आए मामले के बाद यह पता लगाना जरूरी है कि निगरानी व्यवस्था में कहां कमी रही और क्या इस तरह की वित्तीय गड़बड़ी दूसरे जिलों में भी हुई है.
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