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सर्विस‑बुक उपलब्ध न होने के आधार पर प्रोन्नति न देना अवैध: हाईकोर्ट

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने जनक कुमारी सिन्हा की याचिका पर सरकार और रांची विश्वविद्यालय को दिशा-निर्देश दिया है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने रांची विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को 06.02.2024 के शो कॉज पत्र के संबंध में आवश्यक कार्रवाई शीघ्र करने का निर्देश दिया है.
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  • राज्य सरकार 12 सप्ताह के भीतर ले अंतिम निर्णय 

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने जनक कुमारी सिन्हा की याचिका पर सरकार और रांची विश्वविद्यालय को दिशा-निर्देश दिया है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की कोर्ट ने रांची विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को 06.02.2024 के शो कॉज पत्र के संबंध में आवश्यक कार्रवाई शीघ्र करने का निर्देश दिया है. 


कोर्ट ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय ने शो कॉज का उत्तर नहीं दिया है तो वह चार सप्ताह में उत्तर दे और राज्य सरकार 12 सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय ले. सेवा पुस्तिका के अभाव को आधार बनाकर लाभ न देने वाली टिप्पणी को कोर्ट ने रद्द कर दिया. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार ने पक्ष रखा.

 

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के मामले पर विचार न करने का कारण सेवा पुस्तिका उपलब्ध न होना कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सेवा पुस्तिका नियोक्ता के कार्यालय में रखी जाने वाली आधिकारिक अभिलेख होती है. इसलिए केवल सेवा पुस्तिका उपलब्ध न होने के आधार पर कर्मचारी को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.


दरअसल याचिकाकर्ता की नियुक्ति 25 अगस्त 1981 को लैब-इन-चार्ज के रूप में हुई थी और वे 31 जनवरी 2007 को सेवानिवृत्त हुईं. रांची विश्वविद्यालय ने 06.02.2016 के नोटिफिकेशन के माध्यम से उन्हें 01.08.2000 से डिमॉन्स्ट्रेटर (सेलेक्शन ग्रेड) के पद पर प्रमोट किया था, पर 19.10.2016 के वेतन संशोधन (5वीं व 6ठीं पे स्केल) के बावजूद उन्हें समुचित वेतन व लाभ नहीं दिए गए. विभाग ने बाद में 6 फरवरी 2024 को एक पत्र जारी कर पहले दी गई पदोन्नति को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

 

कोर्ट ने मामले की सुनवाई में कहा कि विश्वविद्यालय ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि पदोन्नति के समय पैसों के समायोजन के दौरान अभिलेखों में याचिकाकर्ता की सेवा‑बुक की फोटोकॉपी उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उन्हें लाभ से वंचित रखा गया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा‑बुक जैसा दस्तावेज हमेशा नियोक्ता के कार्यालय में रहता है, इसलिए "सेवा‑बुक न होने" का आधार कानूनन मान्य नहीं ठहरता और वह हिस्सा रद्द कर दिया.


हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य द्वारा लिए जाने वाले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के उसी विषय पर पहले दिए गए आदेशों को ध्यान में रखा जाए. साथ ही कहा गया कि यदि समान स्थिति वाले अन्य कर्मियों को पहले से लाभ दिया गया है तो समानता के सिद्धांत के अनुरूप इसका पालन आवश्यक होगा. कोर्ट ने याचिका निष्पादित कर दी.

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