के डिगवाडीह स्थित सीएसआईआर-सीआईएमएफआर में आयोजित कार्यशाला में दोनों देशों के वैज्ञानिकों ने इसकी तकनीक पर गहन विचार-विमर्श किया. इस पर शोधपत्र भी प्रस्तुत किए गए. कार्यशाला का आयोजन कोयला क्षेत्रों में बंजर होती जा रही जमीन पर हरियाली लाने और वहां पारिस्थिकी तंत्र विकसित करने को लेकर किया गया था. पैनल चर्चा के दौरान वैज्ञानिकों ने कहा कि खनन एक अस्थायी गतिविधि है. खनन के बाद भी उक्त भूमि को उत्पादक बनाकर बेहतर उपयोग में लाया जा सकता है. भूमि को उत्पादन के अनुकूल बनाने, उस पर हरियाली लाकर पर्यटन, पशुपालन, बहुद्देश्यीय जल निकायों के निर्माण आदि के लिए रणनीति बनानी चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि कोयला कंपनियों को मृदा संरक्षण इंजीनियरिंग, कृषि विज्ञान, पारिस्थितिकी आदि के लोगों को शामिल करते हुए एक अलग सुधार टीम बनानी चाहिए.
दो तकनीकी सत्र में 22 पेपर की रिपोर्ट पर चर्चा
कार्यशाला में दो तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने 22 पेपर की रिपोर्ट पर चर्चा की. चेक गणराज्य के प्रो. जॉन फ्रोज ने खनन के बाद उक्त स्थलों पर होने वाली स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास की भूमिका पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. वहीं, डॉ. मार्टिन बार्टुस्का ने पोस्ट माइनिंग इकोसिस्टम प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिए कृत्रिम जलग्रहण के महत्व के बारे में बताया. आईआईटी-आईएसएम के प्रो. एसके मैती, एनसीएल के एचबी शिंदे और डॉ. आर भूपति, सेल के एचएल गुप्ता ने पर्यावरण के अनुकूल सुधार उपायों पर प्रकाश डाला. सीएसआईआर-सीआईएमएफआर की डॉ. प्रीति सिंह, डॉ. संगीता मुखोपाध्याय और चेक गणराज्य की लूसी हुब्लोवा ने कोयला खदान स्थलों की मिट्टी की गुणवत्ता वाले कार्बन स्टॉक के अध्ययन, खान सुधार में बायो-चार, फ्लाई ऐश और रॉक डस्ट के महत्व पर चर्चा की. यह भी पढ़ें : धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-sudama-choubey-waged-war-against-the-british-from-kaimur/">धनबाद: सुदामा चौबे ने कैमूर से छेड़ी थी अंग्रेजों के खिलाफ जंग [wpse_comments_template]

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