Dhanbad : धनबाद-मुंबई (लोकमान्य तिलक टर्मिनस) साप्ताहिक एक्सप्रेस ट्रेन के उद्घाटन समारोह में आमंत्रण रद्द किए जाने से पैदा हुए विवाद के बाद रेल प्रशासन बैकफुट पर आ गया है. धनबाद रेल मंडल के सीनियर डीसीएम व डीओएम मंगलवार को सिंह मेंशन पहुंचे और पूरे मामले पर खेद जताते हुए अपनी गलती स्वीकार की. दोनों अधिकारियों ने मेयर संजीव सिंह व विधायक रागिनी सिंह से माफी मांगी और इसे प्रशासनिक चूक बताया.
रेल अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा नहीं बनेगी. उन्होंने कहा कि आगे से सभी कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल, समन्वय और संचार व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाएगा. ताकि किसी भी जनप्रतिनिधि को असहज स्थिति का सामना न करना पड़े.
रेलवे ने दबाव में लिया निर्णयः संजीव सिंह
वहीं, इस पूरे मामले में मेयर संजीव सिंह ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दबाव में लिया गया निर्णय प्रतीत होता है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर किसी का ब्लड प्रेशर उनकी मौजूदगी से बढ़ रहा है, तो उसका इलाज बाघमारा, धनबाद या दिल्ली में कराया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सभी जनप्रतिनिधियों का सम्मान होना चाहिए चाहे वे पक्ष में हों या विपक्ष में. किसी को आमंत्रित कर अंतिम समय में रोकना न केवल व्यक्ति का, बल्कि उस क्षेत्र की जनता का भी अपमान है.
कैसे शुरू हुआ विवाद
विवाद की शुरुआत तब हुई जब मेयर संजीव सिंह व झरिया विधायक रागिनी सिंह को उद्घाटन समारोह के लिए विधिवत आमंत्रण भेजा गया. उन्हें 6 अप्रैल की रात 10 बजे कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था. कार्यक्रम स्थल पर उनके नाम के बैनर और पोस्टर भी लगाए गए थे. लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से करीब एक घंटे पहले अचानक टेलीफोन और व्हाट्सएप के जरिए सूचना दी गई कि मिस्टेक हो गया है और उनसे कार्यक्रम में न आने का अनुरोध किया गया.इसके साथ ही मंच से उनके नाम वाले पोस्टर भी आनन-फानन में हटा दिए गए. इस घटनाक्रम ने न केवल जनप्रतिनिधियों को आहत किया बल्कि स्थानीय सियासत में भी हलचल मचा दी.
डैमेज कंट्रोल में रेलवे
विवाद बढ़ने और विरोध-प्रदर्शन के बाद रेल प्रशासन डैमेज कंट्रोल में जुट गया. अधिकारियों का सिंह मेंशन पहुंचकर माफी मांगना इसी कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने रेलवे की कार्यप्रणाली, आंतरिक समन्वय व निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या प्रशासनिक फैसलों पर राजनीतिक दबाव हावी हो रहा है.
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