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धनबाद: महुदा में तालाब और कुएं की हुई शादी, सैकड़ों ग्रामीण बने गवाह

झारखंड की पहचान प्रकृति पूजा और उससे जुड़े रीति-रिवाजों से होती है. यहां पेड़-पौधे, जलस्रोत और पहाड़ों को भी आस्था के साथ पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसी परंपरा की एक अनोखी झलक धनबाद जिले के बाघमारा प्रखंड अंतर्गत महुदा पंचायत के महूदा गांव में देखने को मिली.
 

Dhanbad: झारखंड की पहचान प्रकृति पूजा और उससे जुड़े रीति-रिवाजों से होती है. यहां पेड़-पौधे, जलस्रोत और पहाड़ों को भी आस्था के साथ पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसी परंपरा की एक अनोखी झलक धनबाद जिले के बाघमारा प्रखंड अंतर्गत महुदा पंचायत के महूदा गांव में देखने को मिली.

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जहां सूंड़ी बांध (तालाब) और एक कुएं की पूरे विधि-विधान के साथ शादी कराई गई. इस अनोखे आयोजन में गांव के सैकड़ों महिला-पुरुष शामिल हुए और पूरे उत्साह के साथ शादी की रस्में निभाई गई. इस दौरान पुजारी द्वारा मंत्रोच्चार के बीच पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया गया. विवाह में तालाब को वर (दूल्हा) और कुएं को वधु (दुल्हन) का दर्जा दिया गया. गांव के सुरेश राय और उनकी पत्नी बसंती देवी ने इस विवाह की मुख्य रस्में निभाईं.


शादी की खास बात यह रही कि इसमें भी सामान्य विवाह की तरह वर और वधु पक्ष बनाए गए, बाराती शामिल हुए और पूरे गांव ने गवाह बनकर इस अनूठी परंपरा को निभाया. पीपल का विशाल वृक्ष इस विवाह का साक्षी बना. जिसे ग्रामीणों ने पवित्र मानते हुए पूजा-अर्चना भी की. 

विवाह की एक महत्वपूर्ण रस्म में महिलाओं द्वारा तालाब (वर पक्ष) का पानी लाकर कुएं (वधु पक्ष) में डाला गया. इसके बाद दोनों जलस्रोतों को प्रतीकात्मक रूप से एक डोर से बांधा गया, जो उनके बंधन का प्रतीक माना जाता है. शादी के उपरांत पूरे गांव में सामूहिक भोज का आयोजन भी किया गया. जिसमें सभी ग्रामीणों ने भाग लिया. यह आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को भी दर्शाता है.

 


महुदा गांव की यह अनोखी परंपरा आज भी लोगों के बीच जीवंत है और नई पीढ़ी को प्रकृति से जुड़ाव का संदेश दे रही है. ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है. हालांकि इसकी सटीक शुरुआत कब हुई इसका कोई प्रमाणिक रिकॉर्ड नहीं है. 


मान्यता है कि जिस तालाब या कुएं की शादी नहीं होती, उसके जल को पूजा-पाठ, यज्ञ या वैवाहिक अनुष्ठानों में उपयोग करना शुभ नहीं माना जाता. शादी के बाद जलस्रोत का शुद्धिकरण होता है और फिर उसका पानी धार्मिक कार्यों में उपयोग के योग्य हो जाता है.

 

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