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Entertainment news : ‘कृष्णावतारम’ में दिखा कान्हा का मॉर्डन रूप, कहानी ने जीता दिल

माइथोलॉजिकल फिल्मों की दुनिया में नई पेशकश के तौर पर आई ‘कृष्णावतारम पार्ट 1 ने सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. निर्देशक  हार्दिक गज्जर की इस फिल्म में भगवान श्रीकृष्ण की कथा को आधुनिक सोच और भावनात्मक अंदाज के साथ प्रस्तुत किया गया है.
 

Lagatar desk : माइथोलॉजिकल फिल्मों की दुनिया में नई पेशकश के तौर पर आई ‘कृष्णावतारम पार्ट 1 ने सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. निर्देशक  हार्दिक गज्जर की इस फिल्म में भगवान श्रीकृष्ण की कथा को आधुनिक सोच और भावनात्मक अंदाज के साथ प्रस्तुत किया गया है. 

 

 

यह फिल्म का पहला भाग है, जो द्वारका में कृष्ण (सिद्धार्थ गुप्ता) के जीवन, राधा के साथ वियोग, रुक्मिणी और सत्यभामा के साथ प्रेम, और नरकासुर के वध की कहानी को दर्शाताफिल्म की शुरुआत भगवान कृष्ण के अंतिम क्षणों से होती है, जहां एक शिकारी के तीर से घायल होने के बावजूद वह मृत्यु को उत्सव की तरह स्वीकार करते नजर आते हैं.

 

वहीं राधा की मौन विदाई फिल्म को भावुक बना देती है. शुरुआती दृश्य ही दर्शकों को आध्यात्मिक और काव्यात्मक दुनिया में ले जाते हैं.कहानी को आज के दौर से जोड़ने के लिए निर्देशक ने आधुनिक पीढ़ी और विज्ञान बनाम आस्था के सवालों को भी शामिल किया है. पुरी के जगन्नाथ मंदिर में एक युवक ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाता है, जिसका जवाब एक पुजारी के रूप में नजर आए जैकी श्रॉफ देते हैं. यहीं से कहानी द्वारका के स्वर्णिम युग में प्रवेश करती है.

 

फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण सत्यभामा का किरदार है. अभिनेत्री संस्कृति जयना ने इस भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया है. सत्यभामा और कृष्ण के रिश्ते को जिस गहराई और भावनात्मक स्तर पर दिखाया गया है, वह फिल्म को अलग पहचान देता है. वहीं रुक्मिणी के रूप में निवाशिनी कृष्णन भी प्रभावित करती हैं.

 

भगवान कृष्ण के किरदार में सिद्धार्थ गुप्ता शुरुआत में अपने अलग लुक के कारण थोड़ा चौंकाते हैं, लेकिन आगे बढ़ते हुए अपनी शांत मुस्कान और अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लेते हैं. राधा के किरदार में सुष्मिता भट्ट ने सादगी भरा अभिनय किया है, हालांकि उनका किरदार अपेक्षाकृत कम उभरता है.

 

फिल्म का विजुअल प्रेजेंटेशन इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है. विशाल सेट्स, रंग-बिरंगे दृश्य, शानदार सिनेमैटोग्राफी और प्रभावशाली वीएफएक्स इसे बड़े पर्दे पर एक अलग अनुभव बनाते हैं. कई दृश्य किसी पेंटिंग या पिनटेरेस्ट मूड बोर्ड जैसे नजर आते हैं.

 

संगीत भी फिल्म की आत्मा साबित होता है. बांसुरी की मधुर धुन और भावनात्मक बैकग्राउंड स्कोर दर्शकों को कहानी से जोड़े रखते हैं. हालांकि फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा महसूस होता है और रनटाइम भी लंबा लगता है, लेकिन इसके बावजूद कहानी अपनी भावनात्मक गहराई और भव्यता से प्रभावित करती है.

 

 

 


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