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Exclusive: जंगल से शहर तक ‘रेड शिफ्ट’: झारखंड में बदली नक्सल रणनीति, डेडलाइन के बीच बढ़ी चुनौती

झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन 31 मार्च 2026 की समय-सीमा नजदीक आने के बावजूद चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. राज्य में अब भी 44 हार्डकोर माओवादी सक्रिय हैं, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता बने हुए हैं.
 

Ranchi: झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन 31 मार्च 2026 की समय-सीमा नजदीक आने के बावजूद चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. राज्य में अब भी 44 हार्डकोर माओवादी सक्रिय हैं, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता बने हुए हैं.

 

खुफिया एजेंसियों के अनुसार, लगातार दबाव और कॉम्बिंग ऑपरेशन के कारण नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल दी है. अब वे जंगलों से निकलकर शहरों में शिफ्ट हो रहे हैं और फर्जी पहचान के सहारे आम लोगों के बीच रहकर नेटवर्क संचालित कर रहे हैं. डिजिटल माध्यम से संपर्क बनाए रखते हुए ‘अर्बन नेटवर्क’ को मजबूत किया जा रहा है.


सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पलामू का एक टॉप नक्सली हैदराबाद में रहकर काम कर रहा है और वहीं से नेटवर्क संचालित कर रहा है. वहीं चतरा जिले से जुड़ा टीएसपीसी का एक शीर्ष नक्सली कभी पटना तो कभी दिल्ली में काम करते हुए सक्रिय बताया जा रहा है.


इसके अलावा खूंटी जिले के पीएलएफआई से जुड़े कई नक्सली रांची जैसे बड़े शहरों में छिपकर सक्रिय हैं. इन सूचनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने शहरी इलाकों में निगरानी और सत्यापन अभियान तेज कर दिया है.

 

सरंडा से शहरों तक शिफ्टिंग

पश्चिमी सिंहभूम का सरंडा क्षेत्र, जो कभी नक्सलियों का सुरक्षित गढ़ माना जाता था, अब सुरक्षा बलों के दबाव में कमजोर पड़ा है. इसी कारण नक्सली छोटे समूहों में बंटकर शहरी इलाकों में सक्रिय हो रहे हैं.


सरेंडर पॉलिसी का असर

लगातार दबाव के कारण निचले स्तर के कई नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं, जिससे संगठन के भीतर कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं.

 

31 मार्च की डेडलाइन: क्या बढ़ेगा समय?  

 केंद्रीय स्तर पर 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को निर्णायक रूप से खत्म करने का लक्ष्य तय किया गया है. लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह समय-सीमा पर्याप्त होगी? सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन अपने अंतिम चरण में जरूर है. लेकिन शहरी नेटवर्क के कारण चुनौती जटिल हो गई है, ऐसे में जरूरत पड़ने पर डेडलाइन बढ़ाई भी जा सकती है.
    
हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी तक कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर इस संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा.    
 

 

  

ये माओवादी, पुलिस के लिए चुनौती

एक करोड़ का इनामी माओवादी- पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा, एक करोड़ का इनामी सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश, 25 लाख का इनामी सैक सदस्य अजय उर्फ अजय महतो, 15 लाख का इनामी मोछू उर्फ मेहनत, रीजनल कमेटी सदस्य मदन महतो उर्फ शंकर शामिल है.    
    
इसके साथ आरसीएम संजय महतो उर्फ संतोष, रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन मार्डी, नितेश यादव उर्फ इरफान, बेला सरकार उर्फ पंचमी, सहदेव महतो उर्फ सुभाष, मृत्युंजय उर्फ फरेश, मनोहर गंझू, गोदराय यादव, सालुका कायम, पुष्पा महतो उर्फ शकुंतला व चंदन लोहरा आदि भी चुनौती बने हुए हैं.

 

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