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योजनाओं से जमीनी सच्चाई तक: झारखंड हेल्थ सिस्टम का पूरा साल

Ranchi: एक और साल अपने अंतिम पलों में खड़ा है. कैलेंडर की आखिरी तारीख पर जब पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक ऐसी लंबी कहानी की तरह सामने आती है, जिसमें कहीं नई इमारतों की नींव दिखती है, कहीं एम्बुलेंस की सायरन समय पर नहीं पहुंच पाती, कहीं आधुनिक मशीनें उम्मीद जगाती हैं और कहीं लापरवाही भरोसे को तोड़ती है.

 

2025 झारखंड के स्वास्थ्य तंत्र के लिए केवल योजनाओं का साल नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक टकराव, तकनीकी विस्तार, मानवीय चूक, और व्यवस्था की असल परीक्षा का वर्ष भी रहा. यह वह साल रहा, जब स्वास्थ्य सेवा सिर्फ अस्पतालों की दीवारों में नहीं, बल्कि सड़कों, कैंटीनों, ब्लड बैंकों, अदालतों और एम्बुलेंस के पहियों में भी परखी गई.

 

जनवरी–फरवरी: साल की शुरुआत, योजनाओं की उम्मीद

साल 2025 की शुरुआत राज्य में स्वास्थ्य बीमा कवरेज के विस्तार के साथ हुई. आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना और अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत नई बीमा अवधि लागू की गई. इसके साथ ही लगभग 66 लाख से अधिक परिवारों को मुफ्त इलाज का लाभ मिलने की प्रक्रिया शुरू हुई.

 

इन योजनाओं के तहत न केवल इलाज के नए पैकेज जोड़े गए, बल्कि अस्पतालों और डॉक्टरों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई, ताकि सेवाओं का मानकीकरण हो सके. राज्य सरकार ने यह स्पष्ट किया कि योजना का उद्देश्य केवल कार्ड वितरण नहीं, बल्कि इलाज तक वास्तविक पहुंच सुनिश्चित करना है.

 

स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने डिजिटल कार्ड की घोषणा की. मरीजों को QR आधारित कार्ड दिए जाने लगे, जिससे अस्पतालों में पहचान, पंजीकरण और इलाज की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो सके.

 

इसी अवधि में मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना को स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के दायरे में लाया गया. गंभीर रोगों से जूझ रहे मरीजों के लिए 15 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की व्यवस्था लागू हुई. यह निर्णय उन परिवारों के लिए राहत बना, जिनके लिए बीमारी केवल शारीरिक संकट नहीं, बल्कि आर्थिक तबाही भी होती है.

 

हालांकि, योजनाओं के साथ यह सवाल भी साल की शुरुआत से ही मौजूद रहा— क्या जमीन पर संसाधन, स्टाफ और ढांचा इन योजनाओं का भार उठा पाएगा?

 

मार्च: इन्फ्रास्ट्रक्चर की नींव

मार्च का महीना स्वास्थ्य ढांचे के नाम रहा. राज्य सरकार ने 1117 नए स्वास्थ्य उपकेंद्रों के निर्माण को मंजूरी दी. लगभग 620 करोड़ रुपये की स्वीकृति के साथ यह घोषणा उन दूरदराज इलाकों के लिए महत्वपूर्ण मानी गई, जहां इलाज तक पहुंचना अब भी एक यात्रा जैसा है.

 

2025-26 के बजट में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों के लिए अलग-अलग जिलों में भवन निर्माण और विस्तार के लिए आवंटन किया गया. रांची, गिरिडीह सहित कई जिलों में नई इमारतों और सुविधाओं की योजना बनी. यह वह दौर था, जब कागजों पर स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होती दिख रही थी.

 

अप्रैल: प्रशासनिक उथल-पुथल

अप्रैल आते-आते स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा बदल गया. सरकार ने RIMS निदेशक डॉ. राजकुमार को हटाने का आदेश जारी किया. आदेश में विभागीय निर्देशों के पालन न करने और RIMS अधिनियम 2002 के उल्लंघन का हवाला दिया गया. नियम 9(vi) के तहत तत्काल हटाने और तीन माह के वेतन-भत्ते का प्रावधान भी दर्ज था.

 

18–19 अप्रैल को डॉ. शशिबाला सिंह को अंतरिम निदेशक बनाया गया. लेकिन 28 अप्रैल को झारखंड हाई कोर्ट ने इस नियुक्ति पर रोक लगा दी. अदालत ने टिप्पणी की कि बिना उचित प्रक्रिया के किसी को हटाना कलंकित करने वाला आदेश  है और राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा.

 

डॉ. राजकुमार ने अदालत में कहा कि उपकरण खरीद और बड़े निर्माण कार्यों में मंत्री की पूर्व-स्वीकृति की अनिवार्यता के कारण अस्पताल के कई काम रुके. यह महीना दिखाता रहा कि जब प्रशासनिक स्थिरता डगमगाती है, तो उसका असर सीधे मरीजों तक पहुंचता है.


मई–जून: एम्बुलेंस, डॉक्टर और दबाव

इन महीनों में आपातकालीन सेवाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया. राज्य सरकार ने 300 नई एम्बुलेंस और 30 ALS एम्बुलेंस लाने की घोषणा की. उद्देश्य था कि दूरस्थ इलाकों में आपात सेवाओं की पहुंच तेज हो.


जुलाई: उपलब्धि का महीना

जुलाई में झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को राष्ट्रीय पहचान मिली. रांची सदर अस्पताल आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के क्रियान्वयन में देशभर में पहले स्थान पर रहा. पिछले साल यह दूसरा स्थान था.

 

मेडिकल कॉलेज और अन्य सरकारी संस्थानों की श्रेणी में भी इसे चौथा स्थान मिला. यह उपलब्धि बताती है कि सही निगरानी और क्रियान्वयन से सरकारी अस्पताल भी राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण बन सकते हैं.


अगस्त: असहज सच्चाइयां

अगस्त में रिम्स की एक घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था की आंतरिक सुरक्षा पर सवाल खड़े किए. प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रथम वर्ष की पीजी छात्रा ड्यूटी के दौरान अचानक अस्वस्थ हो गईं. कैंटीन से मंगाई गई चाय का स्वाद और गंध असामान्य बताई गई. चाय पीने के बाद हालत बिगड़ी और उन्हें आपात विभाग में भर्ती कराया गया.

 

इसी महीने वेंटिलेटर संकट सामने आया. रिम्स में 150 में से केवल 10 वेंटिलेटर और सदर अस्पताल में 50 में से सिर्फ 2 चालू पाए गए.
आईसीयू में गंभीर मरीजों को भर्ती से मना किया गया, परिजन निजी अस्पतालों की ओर गए. ABG जैसी जांचों में 5–8 घंटे की देरी दर्ज हुई.

 

सितंबर: घोषणाएं, समझौते और सवाल

सितंबर स्वास्थ्य घटनाओं से भरा रहा. RIMS और ECHS के बीच MoU पर हस्ताक्षर हुए, जिससे कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा लाभ मिला.

कांके स्थित रिनपास अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर गया—मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सौ वर्षों की यात्रा का साक्षी.

डॉ. इरफान अंसारी ने 2100 बेडेड सुपर स्पेशियलिटी किडनी अस्पताल, मेडिको सिटी, छह नए मेडिकल कॉलेज और 200 नई एम्बुलेंस की घोषणा की.

झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी की बैठक में 212 अस्पतालों के लंबित दावों पर निर्णय लिया गया. जिनमें त्रुटि नहीं पाई गई, उनका भुगतान करने का फैसला हुआ.

मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में 700 अबुआ मेडिकल स्टोरशुरू करने की योजना घोषित हुई.

इसी महीने स्वस्थ नारी सशक्त परिवार अभियान ने बड़ी उपलब्धियां दर्ज कीं—

31,036 शिविर, 15.32 लाख लाभार्थी, हजारों जांच, टीकाकरण, सर्जरी और कार्ड जारी हुए.

लेकिन इसी महीने सदर अस्पताल में डॉक्टरों के साथ मारपीट हुई. विरोध में स्टाफ ने कार्य बहिष्कार किया.


अक्टूबर: उपलब्धि और विफलता आमने-सामने

अक्टूबर सबसे भारी महीनों में गिना गया.

एक ओर सदर अस्पताल में ‘कंप्लीट साइटस इनवर्सस’जैसे दुर्लभ केस की सफल सर्जरी हुई. आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह निःशुल्क.

दूसरी ओर खांसी सीरप में DEG पाए जाने की पुष्टि हुई. तीन कंपनियों की दवाएं मानक से बाहर पाई गईं.

रिम्स की बदहाली सामने आई—गंदगी, टूटे बाथरूम, पानी की कमी, खुले मेडिकल कचरे, रैन बसेरा बंद.

सबसे गंभीर घटना चाईबासा में थैलेसीमिया बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ाए जाने का मामला.

मुख्यमंत्री के निर्देश पर तीन अधिकारी निलंबित, जांच समिति गठित.

108 एम्बुलेंस सेवा की लापरवाही, सड़क दुर्घटनाओं में देरी, तकनीकी खराबियां, रिकॉर्ड में हेरफेर—सब उजागर हुआ.


नवंबर: तकनीक और अनियमितताएं

नवंबर में  RIMS में 3 Tesla MRI मशीन का सफल ट्रायल हुआ.

ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट के लिए 10 करोड़ से अधिक की मंजूरी दी गई.

लेकिन इसी महीने 108 एम्बुलेंस सेवा में रिकॉर्ड हेरफेर, गैर-कार्यरत एम्बुलेंस को चालू दिखाकर भुगतान लेने के आरोप सामने आए.

हीमोफीलिया ट्रीटमेंट सेंटर में अनियमितताओं की जांच के आदेश दिए गए.

MGM मेडिकल कॉलेज के छात्रों ने सत्र में देरी को लेकर NMC से हस्तक्षेप की मांग की.


दिसंबर: भविष्य की घोषणा, वर्तमान की अव्यवस्था

दिसंबर में झारखंड को पहले मेडिकल विश्वविद्यालय की घोषणा मिली.

ब्राम्बे परिसर में निरीक्षण हुआ. 6–7 महीनों में लागू करने की बात कही गई.

इसी दौरान डॉक्टरों की कमी से निपटने के लिए निर्णय लिया गया कि झारखंड से MBBS करने वाले चिकित्सकों को कम से कम पांच वर्ष तक 

राज्य में सेवा देना अनिवार्य होगा. यह कदम ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के लिए अहम माना गया.


वहीं RIMS की अव्यवस्था फिर सामने आई—गंदगी, पानी की कमी, खुले कचरे, बंद रैन बसेरा, ठंड में परिजनों की परेशानी.

108 एम्बुलेंस कर्मचारियों की समस्याओं पर उच्चस्तरीय बैठक हुई, लेकिन लंबित समझौतों के लागू न होने की बात सामने आई.


साल का अंत

2025 झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक आईना रहा. इस आईने में योजनाओं की चमक भी दिखी, और व्यवस्था की दरारें भी. जहां कहीं नई मशीनों की आवाज थी, वहीं कहीं एम्बुलेंस की देरी में खामोशी. यह साल सवाल छोड़ गया, लेकिन दिशा भी दिखा गया कि स्वास्थ्य केवल योजना नहीं, बल्कि भरोसा, निगरानी और जिम्मेदारी का नाम है.

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