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घाटशिला उपचुनाव : होगा कुछ नया या चलेगा वही पुराना सिलसिला

भारतीय जनता पार्टी के लिये घाटशिला विधानसभा सीट के लिये होने वाले उपचुनाव की डगर काफी कांटों भरी साबित हो सकती है. उपचुनाव की प्रशासिनक तैयारियां शुरू होने के साथ ही एसटी के लिये सुरक्षित इस क्षेत्र में राजनीतिक सुगबुगाहट भी तेज हो चुकी है. मतदाता सूची का पुनरीक्षण कार्यक्रम जारी है और इसका अंतिम प्रकाशन 29 सितंबर को होगा. संभावना है कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ ही यहां भी उपचुनाव की घोषणा कर दी जाएगी. फिलहाल जनता इस बीच कई तरह की राजनीतिक चर्चाओं में व्यस्त हो चुकी है. उम्मीदवारों को लेकर भी कयासबाजी जारी है, खासकर भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के संदर्भ में.
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सांकेतिक तस्वीर.

 Priyesh Kumar Sinha

Jamshedpur: भारतीय जनता पार्टी के लिये घाटशिला विधानसभा सीट के लिये होने वाले उपचुनाव की डगर काफी कांटों भरी साबित हो सकती है. उपचुनाव की प्रशासिनक तैयारियां शुरू होने के साथ ही एसटी के लिये सुरक्षित इस क्षेत्र में राजनीतिक सुगबुगाहट भी तेज हो चुकी है. मतदाता सूची का पुनरीक्षण कार्यक्रम जारी है और इसका अंतिम प्रकाशन 29 सितंबर को होगा. संभावना है कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ ही यहां भी उपचुनाव की घोषणा कर दी जाएगी. फिलहाल जनता इस बीच कई तरह की राजनीतिक चर्चाओं में व्यस्त हो चुकी है. उम्मीदवारों को लेकर भी कयासबाजी जारी है, खासकर भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के संदर्भ में.

झामुमो की जीत की हैट्रिक होगी या कुछ उलटफेर

दरअसल 2024 में यहां से झामुमो की टिकट पर जीत कर विधायक बने रामदास सोरेन के निधन के बाद सीट खाली होने के कारण यहां उपचुनाव होना है. वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री रह चुके स्वर्गीय रामदास सोरेन यहां से तीन बार विधायक रह चुके थे. लिहाजा उनके पुत्र सोमेश सोरेन को झामुमो से टिकट मिलना तय माना जा रहा है. हाल ही में हुए पार्टी के विधानसभा स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन में इस बात की स्पष्ट घोषणा भी की जा चुकी है. अब चर्चा यह है कि झामुमो की जीत की हैट्रिक होगी या कुछ उलटफेर हो सकता है. दूसरी तरफ प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. 2024 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया था लेकिन वह चुनाव हार गए थे. इसबार उपचुनाव में कौन प्रत्याशी होगा यह अभी तय नहीं है. वहीं अन्य दलों की ओर से भी अभी तक कोई पहलकदमी नहीं दिख रही है.

लड़ने से परहेज कर सकते हैं भाजपा के बड़े चेहरे

भारतीय जनता पार्टी के लिये इस क्षेत्र में पहली लड़ाई तो प्रत्याशी के चयन को लेकर लड़नी पड़ सकती है. बाबूलाल सोरेन को दोबारा प्रत्याशी बनाना इतना आसान नहीं होगा. पिछला चुनाव हारने के बाद भाजपा के कई वरिष्ठ नेता टिकट के लिये मुंह बाए खड़े हैं. चर्चा तो यहां तक है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा की निगाह भी इस सीट पर है. वह खुद या अपनी पत्नी के लिये इस सीट की इच्छा रखते हैं. हालांकि उनकी पत्नी मीरा मुंडा  2024 के विधानसभा चुनाव में पोटका से भाग्य आजमा चुकी हैं. वहां जीत हासिल नहीं हुई थी. वैसे भी भाजपा ने घाटशिला से कभी अपना प्रत्याशी रिपीट नहीं किया है. वैसे कहा यह भी जा रहा कि सहानुभूति लहर से इस उपचुनाव के प्रभावित होन की संभावना के कारण बड़े चेहरे शायद चुनाव लड़ने से परहेज करें.

त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला होने पर ही हो सकता है उलटफेर

भारतीय जनता पार्टी के साथ यहां सबसे बड़ी चिंता यह है कि वोट शेयर लगातार बढ़ने के बाद भी उसे यहां से एक बार ही जीत हासिल हो पाई है. 2005 में भाजपा के रामदास हांसदा को 16.75% वोट मिले थे, 2009 में पार्टी ने सूर्य सिंह बेसरा पर दांव खेला और वोट मिले 22.52%, 2014 में लक्ष्मण टुडु  ने 32.48% वोट शेयर प्राप्त कर जीत हासिल की, 2019 में भाजपा के लखन चंद्र मार्डी 33.41% मत पाने के बावजूद दूसरे नंबर पर रहे. यही स्थिति 2024 में भी रही मत प्रतिशत बढ़ने के बावजूद पार्टी प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन जीत हासिल नहीं कर पाये. उन्हें 39.75% वोट मिले थे. अब 2014 में भी जीत का गणित यह है कि कांग्रेस प्रत्याशी सिंड्रेला बलमुचु ने 22.69  और निर्दलीय कान्हु सामंत ने 7.54 प्रतिशत वोट हासिल कर भाजपा की जीत की राह आसान कर दी थी. वैसे प्रत्याशी जो भी हों अब तक के चुनावी आंकड़े यही बताते हैं कि जब तक मुकाबला जोरदार त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय नहीं होगा झामुमो को यहां से पराजित करना संभव नहीं है. 2024 के चुनाव में झामुमो के मिले 50 प्रतिशत से अधिक वोट इसकी गवाही देते हैं.

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