Gaurav Prakash Hazaribagh: कटकमसांडी प्रखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्र स्थित वियर डैम पर बनी 13 करोड़ की नहर से बूंदभर भी सिंचाई नहीं हो सकी. मानसून ने इस वर्ष किसानों को धोखा दे दिया. जबकि पटवन के लिए मात्र नहर ही सहारा रह गया है. लघु सिंचाई विभाग से बनी 13 करोड़ की नहर से 13 इंच जमीन भी नहीं भींग पायी. लघु सिंचाई विभाग से बनाई गई नहर की जमीनी हकीकत कुछ और ही है. बता दें कि बरसाती चेक डैम पर लघु सिंचाई विभाग की ओर से डैम के सहारे नौ किलोमीटर नहर बनाई गई है. प्रखंड के रेबर गांव में पहाड़ के पानी को रोक कर दो वियर डैम करीब 50 साल पहले बनाई गई थी. इसी डैम से लघु सिंचाई विभाग को योजना बनाकर एक डैम से नहर के माध्यम से रेबर के पूर्वी छोर होते हुए कुटीपीसी होरिया तक पानी ले जाना है. वहीं दूसरे डैम से नहर रेफर के पश्चिमी हिस्से से बलिया होते हुए गरबा तक पानी ले जाना है. लेकिन तालाब सरीखे दोनों डैमों में बरसात के चार माह में ही पानी रहता है. जाड़े व गर्मी में जब पटवन की जरूरत होती है, उस समय डैम बिल्कुल सूखा रहता है. ग्रामीण चंदन मेहता कहते हैं कि ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि जब इन नहरों से आठ महीने ग्रामीणों को सिंचाई की सुविधा नहीं मिलती है, तो नहर निर्माण के नाम पर सेंक्शन कराकर करोड़ों की सरकारी राशि का दुरूपयोग क्यों किया गया. ग्रामीण मुनेश ठाकुर कहते हैं कि नहर बनाने के लिए होमवर्क किया ही नहीं गया. जहां पानी जमा ही नहीं होता है, वहां नहर बना दिया गया है. ऐसे में सरकार के करोड़ों रुपए बर्बाद हो गए. जब सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है, तो नहर में पानी रहता ही नहीं है. यही नहीं पिछले साल बरसात में दो जगह लगभग 40 मीटर की दूरी पर नहर बह गया और बालू दिखने लगा. ग्रामीण राजेंद्र मेहता कहते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पदाधिकारी भी कभी-कभार आकर यहां निरीक्षण करते हैं. लेकिन संवेदक ने नहर बनाने के दौरान घोर लापरवाही की है. स्थानीय ग्रामीण से लेकर जनप्रतिनिधि तक इस नहर के औचित्य पर सवाल खड़ा कर चुके हैं. बता दें कि सिंचाई योजना के तहत रेबर, बलिया, कुटीपीसी व गरबा गांव के आसपास के छह गांवों के लिए करीब नौ किमी. नहर बनाई गई है. इसकी प्राक्कलित राशि करीब 15 करोड़ रुपए थी. नहर निर्माण में प्राक्कलन राशि से कम 13 करोड़ में काम पूरा किया गया. नहर निर्माण के बाद उसका पानी खेतों में जाना चाहिए, न कि खेतों का पानी नहर से होते हुए उल्टा डैम में. जबकि कुटीपीसी के समीप खेतों का पानी नहर में चला जाता है. इसे भी पढ़ें– सुशील">https://lagatar.in/sushil-modi-said-jdu-will-be-free-bihar-lalan-singhs-answer-the-country-will-be-free-from-rhetoric/">सुशील
मोदी बोले- जदयू मुक्त होगा बिहार; ललन सिंह का जवाब- देश जुमलेबाजों से होगा मुक्त बताया जाता है कि इस योजना के तहत दो हजार हेक्टेयर में सिंचाई की योजना थी. बरसात के अलावा अन्य दिनों में खाली पड़े खेतों तक गर्मा फसल की उपज लेने के लिए नहर बनाने की योजना थी. लेकिन संवेदक को लाभ देने के लिए उसे तालाब से जोड़ दिया गया, जिसमें पानी जाड़े में ही सूख जाता है. जब इस मामले को लेकर जलपथ प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता बलराम मुर्मू से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अखबार ‘शुभम संदेश’ की टीम से ही उन्हें जानकारी मिली है. अब एसडीओ स्तर के पदाधिकारी को भेजकर पूरे मामले की जांच करेंगे. कोशिश की जाएगी कि योजना का लाभ ग्रामीणों तक पहुंचे. इसके लिए पहल करेंगे. इसे भी पढ़ें– हेमंत">https://lagatar.in/employees-expressed-their-gratitude-by-meeting-hemant-cm-took-a-jibe-at-modi-government/">हेमंत
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हजारीबाग: 13 करोड़ की नहर से 13 इंच जमीन भी नहीं भीगी

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