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हजारीबाग: स्वतंत्रता संग्राम में कृष्ण पाठक ने कलेक्ट्रेट पर फहराया था तिरंगा

Gaurav Prakash Hazaribagh: आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसी गुमनाम सेनानियों की खोज जारी है, जिनकी संघर्ष गाथा या तो अनकही रही है या फिर आधा अधूरा दर्शाया गया. ऐसे ही सेनानियों में थे कृष्ण कुमार पाठक. वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी उम्र मात्र 14 वर्ष था. जिला स्कूल के आठवीं कक्षा के छात्र थे. उनका बस एक ही मकसद था कि अपना देश स्वतंत्र हो जाए. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/66-1.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> हाल तक कृष्ण कुमार पाठक को हजारीबाग की सड़कों पर पैदल घूमते हुए देखा जा सकता था. उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती थी. लोगों को बहुत कम ही मालूम था कि यह व्यक्ति 14 वर्ष की उम्र में कुछ ऐसा काम कर गया, जो आज इतिहास के पन्नों में विस्मृत होता जा रहा है. 2015 में इस शख्सियत का निधन हो गया था. उन्होंने स्वतंत्रता के लिए एक छात्र के रूप में संघर्ष किया. लेकिन सिर्फ और सिर्फ अपना काम किया. इसके लिए कोई दाम नहीं लिया और न नाम की चाहत की. इस शख्स के बारे में विनोबा भावे विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर डॉ प्रमोद कुमार बताते हैं कि उन्होंने एक साक्षात्कार में उनसे पूछा था कि अचानक क्या हुआ, उन्होंने जो परिवार की बिना इजाजत के इतना बड़ा निर्णय ले लिया और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया. तब कृष्ण कुमार पाठक ने मुस्कुराते हुए कहा था कि पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा गूंज रहा था. उस समय वे जिला स्कूल हजारीबाग के छात्र थे. नौ अगस्त 1942 को अचानक क्लास छोड़कर अपने कुछ साथियों के साथ उन्होंने तिरंगा लेकर शहर में जुलूस निकाला. नारा था- अप -अप इंडियन फ्लैग, डाउन -डाउन यूनियन जैक…। दरअसल यह छात्रों की सभा थी. सिर्फ नौनिहाल छात्र ही इस में 10 -12 की संख्या में थे. इसमें रामबाबू कस्तूरमल अग्रवाल और सीताराम साहू जैसे लोगों के नाम उन्हें याद थी. नवाबगंज होते जुलूस परिभ्रमण करते हुए समाहरणालय के भवन पर लोहे की लगी हुई सीढ़ी पर चलते हुए झंडा फहरा दिया. अचानक चारों ओर से पुलिस टीम की घेराबंदी से समाहरणालय रण क्षत्र में बदल गया था. लेकिन छात्र डरे नहीं, बल्कि जोर-जोर से और भी नारा बुलंद करने लगे. उस समय रसल साहब एसपी थे, जो छात्रों के प्रति काफी संवेदनशील थे. शाम होते-होते उन लोगों को मुक्त कर दिया गया. सभी छात्र अपने घरों को लौट आए. यह घटना शायद बहुत कम लोगों को मालूम है. इसे भी पढ़ें-  बीजेपी">https://lagatar.in/bjps-pc-state-president-nitish-betrayed-the-people-and-mandate-of-bihar/">बीजेपी

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डॉ प्रमोद कुमार कहते हैं कि अमृत महोत्सव के अवसर पर जब आजादी का मंथन हो रहा है, तो निश्चित तौर पर ऐसे लोगों के बारे में बलिदान का अमृत छलकेगा और समाज इस पर गौरव करेगा. आज भी डीसी कार्यालय की लोहे की सीढ़ियां उसी हालत में विद्यमान हैं. इमली कोठी निवासी कृष्ण कुमार पाठक स्वतंत्रता सेनानी ने पेंशन की कभी चाहत नहीं की और न मांग की. उनके जेष्ठ पुत्र डॉक्टर अजीत कुमार पाठक के पास देश की आजादी के महासंग्राम से संबंधित उस वक्त के कई दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं. ऐसे अनाम क्रांतिकारी, आजादी के परवाने और सेनानी को आजादी के अमृत महोत्सव पर शत-शत नमन करते हैं. इसे भी पढ़ें- कांग्रेस">https://lagatar.in/congress-will-support-nitish-kumar-without-any-condition-today-is-an-important-day-for-the-politics-of-bihar/">कांग्रेस

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