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Hazaribagh News : जंगल बचाने की जिद ने शिक्षक महादेव महतो को बनाया 'जंगलमैन'

Hazaribagh News: 76 वर्षीय महादेव महतो ने तीन दशक पहले उजड़ते जंगल को बचाने की जो जिद पकड़ी थी, उसने आज एक जन-आंदोलन का रूप ले लिया है.
 
जंगलमैन महादेव महतो,
  • सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी है पर्यावरण की सेवा

Hazaribagh News : हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड के दूधमटिया में हर वर्ष 7 अक्टूबर को पर्यावरण मेला लगता है. इसमें दर्जनों गांवों के हजारों लोग उत्साह से भाग लेते हैं. इस परंपरा की शुरुआत टाटीझरिया क्षेत्र के महादेव महतो ने की थी. आज टाटीझरिया-दूधमटिया वन क्षेत्र अगर पेड़-पौधों से लहलहा रहा है, तो इसके पीछे एक साधारण शिक्षक महादेव महतो का असाधारण संकल्प है.

 

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76 वर्षीय महादेव महतो ने तीन दशक पहले उजड़ते जंगल को बचाने की जो जिद पकड़ी थी, उसने आज एक जन-आंदोलन का रूप ले लिया है. हजारीबाग के टाटीझरिया अंतर्गत बेरहो गांव के रहने वाले महादेव महतो को आज पूरा इलाका सम्मान से 'जंगलमैन' के नाम से पुकारता है. उनके प्रयास से आज न सिर्फ दूधमटिया, बल्कि पूरा टाटीझरिया क्षेत्र घने जंगलों से हरा-भरा हो चुका है.


ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत

1990 के दशक में दूधमटिया वन क्षेत्र में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही थी. उन्हीं दिनों जंगलों के नष्ट होने से बेघर हुए जंगली हाथियों ने ग्रामीण इलाकों में धावा बोलना शुरू कर दिया. हाथियों ने पनिमाको के बुधनी मांझी और बांडीह गांव के भरत प्रजापति को कुचलकर मार डाला. इस घटना ने शिक्षक महादेव महतो को अंदर तक झकझोर दिया.


उन्हें समझ आ गया कि इसके गुनहगार इंसान ही हैं, जिन्होंने वन्यजीवों का प्राकृतिक आश्रय छीन लिया. इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वे जंगलों को उजड़ने से बचाएंगे. इसके बाद महादेव महतो ने वर्ष 1990 से ही जंगल बचाने का प्रयास शुरू कर दिया. लेकिन इस ऐतिहासिक अभियान की वास्तविक शुरुआत 7 अक्टूबर 1995 को हुई. शुरुआत में उन्हें स्थानीय स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.


ग्रामीणों को एकजुट करने के लिए उन्होंने साइकिल से 70-80 किलोमीटर तक की लंबी यात्राएं कीं. धीरे-धीरे उनकी मुहिम रंग लाई और बेरहो, टाटीझरिया, डहरभंगा और दूधमटिया के ग्रामीण इस मुहिम से जुड़ते चले गए. ग्रामीणों के साथ मिलकर वन सुरक्षा समितियां बनाई गईं. इस अभियान को गति देने में सुरेंद्र प्रसाद सिंह, मूलचंद ठाकुर, सरयू महतो, इंदु महतो और बासुदेव सिंह जैसे साथियों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया.

 

उन्होंने वनों को बचाने के लिए 'वृक्ष रक्षाबंधन अभियान' की शुरुआत की. पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लिया गया. इस अभियान को धार्मिक अनुष्ठानों से भी जोड़ा गया, जिससे ग्रामीण भावनात्मक रूप से वनों से जुड़ गए. जिस भी गांव में पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधा जाता, वहां उसकी वर्षगांठ पर पर्यावरण महोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हो गई. देखते ही देखते यह अभियान हजारीबाग पूर्वी वन प्रमंडल के सैकड़ों अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया.

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