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HC का JPSC को निर्देश, प्रार्थी की नियुक्ति के लिए आठ सप्ताह के भीतर करें अनुशंसा

झारखंड हाईकोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र में पति के नाम दर्ज होने की वजह से अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में चयन से वंचित की गई चंचला कुमारी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें राहत दी है.
 
हाईकोर्ट
  • 7वीं से 10वीं  JPSC परीक्षा में नियुक्ति देने का हाईकोर्ट का आदेश
  •   JPSC को प्रार्थी की नियुक्ति के लिए अनुशंसा आठ सप्ताह के भीतर करने का निर्देश 
  • अनुशंसा मिलने के बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश

Ranchi :  झारखंड हाईकोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र में पति के नाम दर्ज होने की वजह से अनुसूचित जाति (SC) वर्ग में चयन से वंचित की गई चंचला कुमारी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें राहत दी है.

 

हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रौशन की कोर्ट ने झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) को चंचला कुमारी की नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुशंसा आठ सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया है.

 

अनुशंसा मिलने के बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया गया है. कोर्ट ने कहा कि यदि प्रमाणपत्र जारी करने में गलती सरकारी अधिकारी की है, तो उसकी सजा अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती है.

 

प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा एवं अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा. हाईकोर्ट से जुड़ी खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें...

 

590 अंक मिलने के बावजूद नहीं हुआ चयन

दरअसल यह मामला 7वीं से 10वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2021 से संबंधित है. JPSC की ओर से जारी विज्ञापन संख्या 01/2021 के तहत चंचला कुमारी ने परीक्षा दी थी.

 

प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा में सफल होने के बाद उन्हें दस्तावेज सत्यापन और साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. चंचला ने दस्तावेज सत्यापन के दौरान 27 मार्च 2019 को जारी जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था, जो उनके पति के नाम के आधार पर जारी हुआ था.

 

JPSC के निर्देश पर उन्होंने अगले दिन यानी 10 मई 2022 को पिता के नाम के आधार पर जारी 9 मई 2022 का जाति प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया. इसके बावजूद 31 मई 2022 को जारी परिणाम में उनका नाम नहीं आया.

 

मार्क्स स्टेटमेंट में उनके आवेदन को अस्वीकार करने का कारण बताया गया कि उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा में SC वर्ग का लाभ लिया था. जबकि अपलोड किया गया जाति प्रमाणपत्र पति के आधार पर जारी था.

 

चंचला को कुल 590 अंक मिले थे. जबकि SC वर्ग का कटऑफ 583 अंक था. यानी उनके अंक अंतिम चयनित अभ्यर्थी के मुकाबले भी अधिक थे.

 

गलती SDO की, अभ्यर्थी को नहीं भुगतनी होगी सजा

कोर्ट ने पाया कि चंचला ने जाति प्रमाणपत्र के लिए 4 जनवरी 2019 को आवेदन किया था. जबकि राज्य सरकार का 25 फरवरी 2019 का पत्र बाद में जारी हुआ था. इस पत्र में अधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र पिता के आधार पर जारी करने का निर्देश दिया गया था.


कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद कोडरमा के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) ने 27 मार्च 2019 को पति के नाम के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया. यदि सरकारी निर्देश का पालन नहीं हुआ तो इसके लिए अभ्यर्थी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

 

अदालत ने  टिप्पणी की कि 25 फरवरी 2019 का सरकारी पत्र न तो राजपत्र में प्रकाशित हुआ था और न ही उसे विधि, नियम, विनियम, अधिसूचना या सरकारी संकल्प का वैधानिक दर्जा प्राप्त था. इसलिए केवल इस पत्र के आधार पर बाद में जारी जाति प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं माना जा सकता.

 

दोनों प्रमाणपत्रों में जाति और पता एक ही

कोर्ट ने दोनों जाति प्रमाणपत्रों का अवलोकन करते हुए पाया कि 27 मार्च 2019 और 9 मई 2022 के प्रमाणपत्रों में स्थायी पता एक ही है और जाति भी समान है.

 

इसलिए यह मामला ऐसा नहीं था, जिसमें चंचला ने विवाह के बाद पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास किया हो. कोर्ट ने कहा कि बाद के प्रमाणपत्र में केवल पति के स्थान पर पिता का नाम दर्ज हुआ है.  जाति या स्थायी निवास में कोई बदलाव नहीं हुआ.

 

JPSC के तर्क को कोर्ट ने नहीं माना

JPSC की ओर से तर्क दिया गया था कि आवेदन के समय पिता के नाम का जाति प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था और बाद में नया प्रमाणपत्र जमा करना विज्ञापन की शर्तों में बदलाव के समान होगा.

 

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि JPSC ने यह नहीं बताया कि 27 मार्च 2019 का प्रमाणपत्र गलत प्रारूप में था या सक्षम अधिकारी ने जारी नहीं किया था.

 

प्रमाणपत्र सक्षम अधिकारी यानी SDO द्वारा जारी किया गया था और विज्ञापन में निर्धारित प्रारूप से भी मेल खाता था. अदालत ने यह भी पाया कि विज्ञापन के प्रोफॉर्मा-IV में पिता के साथ पति का नाम दर्ज करने की व्यवस्था भी थी.

 

कोर्ट ने माना कि जाति प्रमाणपत्र मूल रूप से व्यक्ति की पहले से मौजूद जातिगत स्थिति का प्रमाण है. केवल प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में हुई ऐसी त्रुटि, जो अभ्यर्थी की वजह से नहीं हुई, उसके संवैधानिक आरक्षण अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती.

 

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य की जाति प्रमाणपत्र जारी करने वाली प्राधिकारी की गलती के कारण अभ्यर्थी को दंडित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उसने अपनी श्रेणी में अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक प्राप्त किए हों.

 

 

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