- धारा में संशोधन घटना के बाद हुआ है, इसलिए यह संशोधन पिछली तिथि से प्रभावी नहीं है
Ranchi: हाईकोर्ट ने दहेज मांगने के आरोप में कामाख्या नारायण तिवारी को निचली अदालत से मिली सजा रद्द कर दिया है. गढ़वा की निचली अदालत ने वर्ष 2004 में दहेज निषेध अधिनियम की धारा चार के तहत दोषी करार देते हुए सजा सुनायी थी. हाइकोर्ट ने इस सजा को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि धारा में संशोधन घटना के बाद हुआ है. इसलिए यह संशोधन पिछली तिथि से प्रभावी नहीं है.
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय ने याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन धारा 4 के तहत अपराध साबित करने में असफल रहा. कोर्ट ने कहा कि घटना वर्ष 1984 की है, जबकि दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 के जरिए दहेज की परिभाषा में "विवाह के बाद किसी भी समय" की गई मांग को भी शामिल किया गया था. यह संशोधन 19 नवंबर 1986 से प्रभावी हुआ और इसका पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव नहीं है.
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कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो अपराध की तिथि पर लागू ही नहीं था.
दरअसल यह मामला वर्ष 1979 में हुए विवाह और वर्ष 1984 में कथित दहेज मांग से जुड़ा था. अभियोजन का आरोप था कि विवाह के बाद आरोपी और उसके परिवार ने मोटरसाइकिल की मांग की और मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया. बाद में उसकी मृत्यु हो गई. इस मामले में हत्या के आरोप से ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुका था, लेकिन दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत छह माह की सजा और 5000 रुपये जुर्माना लगाया था.
कोर्ट ने गवाहों के बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि सभी गवाहों ने मोटरसाइकिल की मांग विवाह के बाद किए जाने की बात कही है. किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि दहेज की मांग विवाह के समय या उससे पहले की गई थी, जबकि घटना के समय लागू कानून में यही आवश्यक शर्त थी.
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