Search

 
 
 

हाईकोर्ट ने खनन मुआवजे की रकम लौटाने की मांग ठुकरायी, नौ साल तक निष्क्रिय रहने पर याचिकाएं खारिज

Ranchi News: दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पश्चिमी सिंहभूम के जिला खनन पदाधिकारी ने वर्ष 2017 में Mines and Minerals (Development & Regulation) Act, 1957 की धारा 21(5) के तहत मुआवजे की मांग की थी. विजय कुमार ओझा से 33,60,863 रुपए और अनिल खिरवाल से 2,08,39,666 रुपए की मांग की गयी थी. आरोप था कि पर्यावरणीय स्वीकृति/प्रमाणपत्र में निर्धारित सीमा से अधिक अयस्क का खनन किया गया.
 
फाइल फोटो

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने खनन क्षेत्र से जुड़े दो मामलों में करीब 2.42 करोड़ की मुआवजा राशि वापस करने की मांग खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2017 में जिला खनन पदाधिकारी द्वारा की गयी मांग को चुनौती नहीं दी और भुगतान करने के बाद करीब नौ साल तक निष्क्रिय रहे. बाद में वर्ष 2025 में समान मामलों में राहत मिलने के बाद उन्होंने राशि वापसी की मांग की. ऐसे याचिकाकर्ताओं को अदालत ने कानून की भाषा में ‘फेंस सिटर’ माना. 

 

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने विजय कुमार ओझा और अनिल खिरवाल की ओर से दायर याचिका पर फैसला सुनाया. 

इसे भी पढ़ें - 


मामला क्या था 

दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पश्चिमी सिंहभूम के जिला खनन पदाधिकारी ने वर्ष 2017 में Mines and Minerals (Development & Regulation) Act, 1957 की धारा 21(5) के तहत मुआवजे की मांग की थी. विजय कुमार ओझा से 33,60,863 रुपए और अनिल खिरवाल से 2,08,39,666 रुपए की मांग की गयी थी. आरोप था कि पर्यावरणीय स्वीकृति/प्रमाणपत्र में निर्धारित सीमा से अधिक अयस्क का खनन किया गया.
याचिकाकर्ताओं ने 30 दिसंबर 2017 को राशि जमा कर दी थी. उनका तर्क था कि जिला खनन पदाधिकारी को धारा 21(5) के तहत मुआवजा मांगने का अधिकार ही नहीं था, क्योंकि राज्य सरकार ने धारा 26(2) के तहत उन्हें ऐसी शक्ति का कोई प्रत्यायोजन नहीं किया था.

 

2025 के फैसले का दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के 4 मार्च 2025 के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें समान मामलों में जिला खनन पदाधिकारियों द्वारा जारी मांग नोटिस को अधिकार क्षेत्र के अभाव में रद्द कर दिया गया था और जमा राशि वापस करने का निर्देश दिया गया था. 


राज्य सरकार द्वारा उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली एसएलपी भी 15 दिसंबर 2025 को खारिज हो गयी थी. इसके आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अपनी जमा राशि ब्याज सहित वापस करने की मांग की थी.

 

कोर्ट ने कहा, मांग नोटिस को चुनौती ही नहीं दी

खंडपीठ ने कहा कि वर्तमान मामलों में याचिकाकर्ताओं ने 2017 के मांग नोटिस को कभी चुनौती नहीं दी. उन्होंने राशि जमा की और उसके बाद लगभग नौ साल तक कोई कार्रवाई नहीं की. अदालत ने कहा कि 2025 में दूसरे खनन पट्टाधारकों को राहत मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं ने रिफंड के लिए अभ्यावेदन देना शुरू किया.

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि मांग नोटिस अधिकारविहीन अधिकारी ने जारी किया था, इसलिए वह शून्य था और उसे अलग से चुनौती देने की जरूरत नहीं थी. 

खंडपीठ ने कहा कि जिन मामलों का हवाला याचिकाकर्ताओं ने दिया, उनमें संबंधित पक्षकारों ने अपने अधिकारों के प्रति तत्परता दिखाई थी और समय पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था. वर्तमान मामले में परिस्थितियां अलग हैं. 


अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल पहले के फैसले का लाभ लेने की मांग कर रहे हैं, जबकि उन्होंने मूल मांग नोटिस को ही चुनौती नहीं दी थी. इसलिए उन्हें असाधारण रिट क्षेत्राधिकार में कोई राहत नहीं दी जा सकती.

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही