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भारत और विश्व में बने नैरेटिव से ब्रांड मोदी को हुए नुकसान को पाटने की राह आसान नहीं है

Faisal Anurag

क्या नरेंद्र मोदी की सरकार कोविड की विनाशकारी लहर से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए ज्यादा उत्सुक है या वास्तव में वह ऐसे कदम उठाने जा रही है. जिससे वह अपने आलोचकों को खामोश कर सके?  यह सवाल भारत में सरकार और सिस्टम को लेकर अब दुनिया भर में पूछा जा रहा है. विश्व मीडिया की आलोचनाओं से परेशान सरकार के अधिकारी प्रभावित हुई छवि के बचाव में उतर आये हैं, वहीं भारत के भीतर प्रधानमंत्री कैबिनेट की बैठक के बाद अपने मंत्रियों से क्षेत्र के लोगों से संपर्क में रहने और मदद के लिए आगे आने की बात कर यही संकेत दे रहे हैं. छवियुद्ध वर्तमान संकटों का किस तरह मुकाबला कर सकता है, जिससे देश की बड़ी आबादी जूझ रही है. लेकिन छवि दुरुस्त करने की राह आसान नहीं दिख रही है.

नरेंद्र मोदी की छवि को लेकर सरकार कितनी सजग है, इसे तृणमूल कांग्रेस की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा के एक ट्वीट से समझा जा सकता है. मोइत्रा लिखती हैं- विदेशमंत्री जयशंकर ने भारतीय कूटनीतिज्ञों को आदेश दिया है कि वे विश्व मीडिया से बन रहे ``वन साइडेड नैरेटिव`` का जोरदार विरोध करें. इसी ट्वीट में विदेशमंत्री जयशंकर को याद दिलाया गया है कि उनके सहयोगी रह चुके विदेश सेवा के अधिकारी और पूर्व राजदूत अशोक अमरोही ने पांच घंटे तक अस्पताल के बाहर इंतजार करते हुए दम तोड़ दिया. महुआ आगे लिखती हैं- श्रीमान विदेश मंत्री, इस समय आपके आइएफएस कलीग भी भारत सरकार के  झूठ को शायद ही स्वीकार कर सकने की स्थिति में हैं.

नरेंद्र मोदी की बड़ी चुनौती यह भी है कि भारत और बाहर भी उनकी छवि बेहद कठिन दौर में है. रॉयटर जो कि एक दुनिया की एक बडी न्यूज एजेंसी है, उसने एक खबर दी है. यह खबर प्रधानमंत्री की छवि बनाने के प्रयास के समाने सवाल खड़ा कर रही है. रॉयटर ने दुनिया को बताया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने वैज्ञानिकों की चेतावनियों की उपेक्षा की है. रॉयटर का दावा है कि उसे इसकी सूचना उन चार वैज्ञानिकों ने ही दी है, जो चेतावनी देने वालों में शामिल रहे हैं. यह चेतावनी मार्च के शुरू में ही केंद्र को दी गयी थी.

यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट जिस तरह से सरकार पर लगातार">http://lagatar.in">लगातार

सवाल खड़े कर रहा है, उससे भी नरेंद्र मोदी के छवि निर्माण में सक्रिय एजेंसियों की परेशानी बढ़ ही रही है. वैक्सीन को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को राष्ट्रीय वैक्सीन नीति की याद दिलाई है. साथ ही देश में राष्ट्रीय टीकाकरण मॉडल लागू करने की बात भी की है. कोर्ट ने वैक्सीन के अलग-अलग मूल्य को लेकर भी सवाल उठाया है कि भारत में एक ऐसी बड़ी आबादी है, जिसे टीका फ्री में दिया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से भी पूछा है कि लोगों के अस्पताल में भरती किये जाने की राष्ट्रीय नीति क्या है और सरकार से युद्ध स्तर पर अस्थाई कोरोना सेंटर बनाने की बात कही है. सुप्रीम कोर्ट आक्सीजन सप्लाई को लेकर पहले ही असंतोष प्रकट कर चुका है.

खबर है कि नरेंद्र मोदी की छवि में आयी दरार की भरपाई के लिए आक्रामक प्रचार अभियान चलाया जायेगा.इसकी जिम्मेवारी आइटी सेल और पार्टी को दी गयी है. ऐसे दौर में, जबकि मौतों के आंकड़े हर दिन बढ़ रहे हैं, तब किस बात की ज्यादा चिंता होनी चाहिए. छवि की या फ्रंट पर आकर मुकाबले की. लेकिन मुबई में एक मई को टीकाकरण केंद्रों पर पहुंचे लोगों को वापस कर दिया गया क्योंकि वैक्सीन उपलब्ध नहीं है.बिहार, झारखंड सहित सभी राज्यों की हालत यही है. इससे प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान हो रहा है, लेकिन इसके लिए जिम्मेवारी तो केंद्र की ही है,  जिसने वैक्सीन के पर्याप्त वॉयल राज्यों को नहीं पहुंचाए हैं. कई राज्य सरकारों ने लोगों के फ्री वैक्सीनेशन का वायदा किया है, लेकिन उन्हें वैक्सीन खरीदनी पड़ रही है.

केंद्र ने राज्यों के लिए आठ हजार करोड़ की सहायता देने का निर्णय लिया है लेकिन राज्यों की जरूरत इससे कहीं ज्यादा की है. इससे केंद्र सरकार नरेंद्र मोदी के छवि को बेहतर करने का प्रयास तो कर सकती है, लेकिन हालात नहीं बदल सकते हैं. नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को इस समय अपनी छवि से ज्यादा चिंता और सक्रियता लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए ऑक्सीजन, जरूरी दवाइयों और आक्सीजनयुक्त बेड के लिए दिखानी चाहिए.

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