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जमशेदपुर : एकजुट होकर कर सकते हैं समस्याओं का समाधान : सालखन

Jamshedpur (Ashok Kumar) : कोलकाता के जादवपुर विवि में "एकता में बल है" विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन संताल स्टूडेंट्स वेलफेयर एंड कल्चरल एसोसिएशन की ओर से 17 सितंबर को डॉ केपी वासु मेमोरियल हॉल में किया गया. मौके पर अतिथि वक्ता के रूप में आदिवासी सेंगेल अभियान के सालखन मुर्मू, बादल चंद्र किस्कु, दिशोम माझी (माझी परगना महाल), बालक राम सोरेन, प. बंगाल S T वेलफेयर एसोसिएशन, रूपचंद हांसदा, संताली लेखक संघ को बुलाया गया था. छात्र शिरतोन हेम्ब्रम ने परिचर्चा का संचालन किया. इसे भी पढ़ें : झारखंड">https://lagatar.in/clear-the-way-for-opening-of-skill-university-and-azim-premji-university-in-jharkhand/">झारखंड

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हमारे पास सपना, विजन, मिशन, एक्शन प्लान नहीं है

पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने कहा कि हमारे बीच एकता की कमी का कारण है कि हमारा बड़ा कोई सपना, विजन, मिशन, एक्शन प्लान नहीं है. डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने लगभग 300 सालों से गुलाम हुए नीग्रो लोगों को अमेरिका में एक सपना दिखाकर एकजुट किया. आजाद किया. फ्रीडम या आजादी शब्द ने गांधी नेहरू सुभाष के नेतृत्व में 200 वर्षों तक गुलाम रहे भारतीयों को आजाद किया. अब हम आदिवासी समाज को एकजुट होने के लिए एक बड़ा सपना सामने रखना होगा. जिसमें हमारी प्रकृति पूजक धर्म की मान्यता। संताली को झारखंड में प्रथम राजभाषा का दर्जा देना. आसाम अंडमान के आदिवासियों को एस टी का दर्जा देना. झारखंड दिशोम हम भारत के आदिवासियों का केंद्र बिंदु है,गढ़ है. उसे हर हालत में बचाना और समृद्ध बनाना है. आदिवासी स्वशासन व्यवस्था अर्थात ट्राइबल सेल्फ रूल सिस्टम में सुधार लाना है ताकि हर गांव समाज में जनतंत्र और संविधान लागू हो सके. हम बड़ा सपना देखेंगे तो बड़ी आदिवासी एकता बना सकते हैं. मैजिकल विचारधारा और पुराने एजेंडा को त्याग कर लॉजिकल विचारधारा और नए एजेंडा को अपनाना समय के साथ जरूरी है. धर्म के नाम के लिए झगड़ा गलत है. बल्कि कोई भी नाम से प्राकृति पूजक आदिवासी एकता के सूत्र में बंध सके  जरूरी है. चाहे वह सरना हो या सारीधर्म हो. उन्होंने स्टूडेंट्स एसोसिएशन और एकता परिचर्चा में शामिल सबको धन्यवाद दिया. जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के स्टूडेंट्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित एकता परिचर्चा सफलता की दिशा में एक मील का पत्थर कहा जा सकता है.

आदिवासी एकता, अस्तित्व व अधिकार पर चर्चा

स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विश्वजीत हांसदा ने स्वागत भाषण के साथ विषय प्रवेश किया. कहा कि बगैर आदिवासी एकता के अस्तित्व और अधिकार बचाना मुश्किल है. 75 वर्षों की आजादी के बावजूद आदिवासी के जीवन में  विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है. आदिवासी महिलाओं की हालत ठीक नहीं है. हमें प्रकृति पूजक आदिवासियों की धार्मिक पहचान को तार्किक आधार से हर हाल में मान्यता दिलाना है. अनेक संगठन हैं मगर नतीजे बेकार. एकजुट होकर लड़ना होगा. फासिस्ट शक्तियों का भी मुकाबला करना होगा.

राजनीतिक शक्ति के बगैर कुछ नहीं होगा

अंडाल के संताल जुमीद गावता बहादुर हांसदा ने कहा कि केवल संताल नहीं सभी आदिवासियों की फिक्र करनी चाहिए. राजनीतिक शक्ति के बगैर कुछ भी हासिल नहीं होगा. आदिवासियों का सरना धार्मिक पहचान और मान्यता जरूरी है. नौकरी बचाना जरूरी है. हमें आक्रामक बनना है. पंडित रघुनाथ मुरमू के रास्ते पर चलना होगा. socio-political विचारधारा को बढ़ाना है. आर्थिक समृद्धि एकता और आंदोलन के लिए जरूरी है.

आदिवासियों के हित में बने कानून लागू नहीं हो रहा

बालकराम सोरेन ने कहा कि आदिवासियों के हित में बने संविधान कानून लागू नहीं हो रहे हैं. आरक्षण बचाना जरूरी है. फेक कास्ट सर्टिफिकेट को बंद कराना होगा. हमारे जनप्रतिनिधि ज्यादा कुछ बोलते और करते नहीं हैं. एकता में बल है. यदि हम एक साथ काम नहीं कर सकते हैं तो एक दूसरे का विरोध ना करें. मालदा के समाजसेवी दिलीप किस्कु ने कहा किएकजुटता के लिए अपने दिल दिमाग और मानसिकता को व्यापक बनाना होगा.

पॉलिटिकल को समझना होगा

बादल चंद्र किस्कू ने कहा कि socio-political और केवल पॉलिटिकल को समझना होगा. अंग्रेजो के खिलाफ माझी परगना व्यवस्था से लोग एकजुट हुए थे. संघर्ष किए थे. परन्तु आज की परिस्थिति बदल गई है. इशू भितिक एकता संभव है. एक और समस्या भी है धर्म के मामले में नाम के लिए आपसी तनाव ठीक नहीं है. मिल बैठकर हम लोग इसका हल निकालेंगे. ईगो को छोड़ना होगा. छात्रा लीना सोरेन ने कहा कि एकता खतरा में है. कॉमन ऑब्जेक्ट लेकर चलें. बीच में दो सुंदर एकता गीतों को छात्रा लन्टिटी किस्कू ने  प्रस्तुत किया. धन्यवाद एवं समापन वक्तव्य बिश्वजीत हांसदा ने दिया. कहा- माझी परगना व्यवस्था में सुधार जरूरी है. धार्मिक मान्यता जरूरी है. इसको तार्किक तरीके से एकमत होकर सफल बनाना है. यदि ज्यादा लोग और सभी आदिवासी "सरना" स्वीकार करते हैं, तो इसे मान लेना चाहिए. फेक सर्टिफिकेट की रोकथाम भी जरूरी है. आदिवासी समाज में आर्थिक समृद्धि जरूरी है. एक दूसरे संगठन का निरर्थक  क्रिटिसाइज ना करें. जादवपुर विश्वविद्यालय में संताली भाषा विभाग स्थापित करने में आप लोगों के सहयोग की अपेक्षा है. इसे भी पढ़ें : भाजपा">https://lagatar.in/bjp-is-auditing-the-work-of-mps-those-who-perform-poorly-can-be-blamed/">भाजपा

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