फर्जी प्रसव आंकड़ों से चमकाई जा रही रिपोर्ट
Jamtara : जमाताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक ऐसा खेल सामने आया है जिसने पूरे तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिन आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में प्रसव की समुचित व्यवस्था नहीं है, वहां से गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या दूसरे अस्पतालों में भेजा जाता है.
प्रखंड के आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के बंद पड़े प्रसव केंद्रों के नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में दर्जनों प्रसव दिखाए गए हैं. सवाल यह है कि आखिर कागजों पर पैदा हुए ये बच्चे हैं कौन और उनका जन्म हुआ कहां?
केंद्र बंद, पर रिकॉर्ड में प्रसव की भरमार
अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक के रिकॉर्ड में अर्जुनडीह में 45, शिमला में 21, बुटबेरिया में 15, कालीपहाड़ी में 129, कुरता में 15, मदनाडीह में 10, मंझलाडीह में 12, रूपडीह में 56 और सिंदरी में 25 प्रसव दर्ज किए गए हैं. हकीकत यह है कि इन केंद्रों में प्रसव कराने के लिए आधारभूत सुविधाएं तक नहीं हैं.कई जगहों पर प्रसव कक्ष बदहाल हैं, आवश्यक उपकरण नहीं हैं और जोखिम वाले मामलों को तत्काल दूसरे अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है.
किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रसव केंद्रों की स्थिति वर्षों से खराब है, तो फिर रिकॉर्ड में लगातार प्रसव कैसे दर्ज होते रहे? क्या संबंधित एएनएम पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव था? क्या आंकड़े केवल विभागीय उपलब्धि दिखाने के लिए भरे गए? यदि ऐसा हुआ, तो इसकी जानकारी उच्च अधिकारियों को नहीं थी या फिर सब कुछ उनकी जानकारी में हो रहा था?
यदि महीनों तक फर्जी या संदिग्ध आंकड़े पोर्टल व रजिस्टर में अपलोड होते रहे, तो इसकी जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर नहीं डाली जा सकती. सीएचसी प्रबंधन, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई व जिला स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था भी कटघरे में खड़ी होती है.
'आंकड़े दो, व्यवस्था बाद में देखेंगे' वाली मानसिकता
एक एएनएम ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि प्रसव केंद्रों की स्थिति बेहद खराब है. प्रसव नहीं दिखाने पर वेतन रोकने तक की बात कही जाती है. इसका मतलब है कि विभाग का फोकस स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने की बजाय आंकड़ों की खेती करने पर अधिक है.
जांच हुई तो कई चेहरे होंगे बेनकाब
जरूरत इस बात की है कि अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक दर्ज प्रत्येक प्रसव की स्वतंत्र जांच कराई जाए. जिन महिलाओं का नाम रिकॉर्ड में दर्ज है, उनसे पूछताछ हो कि उनका वास्तविक प्रसव कहां हुआ था. यदि रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर मिला तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को स्वास्थ्य सेवाओं का आधार बनाने की बात करती है. लेकिन जमीनी स्तर पर सुविधाएं नदारद हैं और कागजों पर उपलब्धियां गढ़ी जा रही हैं.
बड़ा सवाल
अब सवाल यह है कि क्या जिला स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर कागजों में गूंजती किलकारियों के सहारे व्यवस्था की नाकामी को ढंकने का प्रयास जारी रहेगा?
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