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जननायक शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को लोक सेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में शिबू सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया. शिबू सोरेन के निधन के बाद उनकी ओर से यह सम्मान उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया.
 

New Delhi: दिशोम गुरु शिबू सोरेन को लोक सेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में शिबू सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया. शिबू सोरेन के निधन के बाद उनकी ओर से यह सम्मान उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया. इस दौरान गांडेय विधायक कल्पना सोरेन,अंजनी सोरेन के साथ ही परिवार के और लोग भी मौजूद थे.सभी इस दौरान भावुक हो गए.


शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य के गठन के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों के अधिकारों की लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी. उनके लंबे राजनीतिक और सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान से अलंकृत किया.

 


सम्मान समारोह के दौरान शिबू सोरेन के योगदान को याद करते हुए उन्हें जननायक, आदिवासी अस्मिता के प्रतीक और झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता के रूप में श्रद्धापूर्वक नमन किया गया.

संघर्ष से सम्मान तक का यह सफर सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, उसके सपनों और उसके लंबे आंदोलन की कहानी भी है. संताल परगना के गांवों से उठी उनकी आवाज ने कभी महाजनी प्रथा, विस्थापन और आदिवासी अधिकारों के सवाल को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया था.

झारखंड के लाखों लोगों के लिए शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि उम्मीद, संघर्ष और पहचान का दूसरा नाम थे. यही कारण है कि उन्हें प्यार से दिशोम गुरु कहा जाता था. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन आदिवासी समाज और वंचित तबकों के मुद्दों को लगातार उठाते रहे.

राष्ट्रपति भवन में जब रूपी सोरेन ने पद्म भूषण सम्मान ग्रहण किया, तो वह पल सिर्फ एक सम्मान समारोह का हिस्सा नहीं था. वह झारखंड आंदोलन के उन अनगिनत संघर्षों, आंदोलनों और सपनों को भी सम्मान देने का क्षण था, जिनसे राज्य की पहचान जुड़ी हुई है. दिशोम गुरु अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनके संघर्ष और झारखंड के लिए उनका सपना आने वाले समय तक लोगों के दिलों में जीवित रहेगा.

 

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