Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग कंपनी राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को राहत देते हुए राज्य सरकार के ब्लैकलिस्टिंग आदेश को रद्द कर दिया है. हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले में अपने फैसले में कहा कि किसी भी संस्था या कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने से पहले उसे स्पष्ट रूप से कारण बताओ नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर प्रदान करना अनिवार्य है.
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खंडपीठ ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई ब्लैकलिस्टिंग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है. अपने आदेश में खंडपीठ ने ब्लैकलिस्टिंग संबंधी आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन नहीं किया था. इसके साथ ही कोर्ट ने अनुबंध समाप्ति से जुड़े सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रखते हुए याचिका को निष्पादित कर दिया.
दरअसल, याचिकाकर्ता राइडर सिक्योरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत कंपनी का अनुबंध समाप्त करने के साथ-साथ उसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था. कंपनी का कहना था कि विभाग ने जारी कारण बताओ नोटिस में केवल अनुबंध समाप्त करने का उल्लेख किया था, जबकि ब्लैकलिस्ट करने का कोई प्रस्ताव नहीं बताया गया था.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि 31 जनवरी 2023 को जारी कारण बताओ नोटिस में कहीं भी यह नहीं लिखा गया था कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है. इसके बावजूद बाद में विभाग ने कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया. अदालत ने कहा कि किसी संस्था को ब्लैकलिस्ट करने से पहले यह स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक है कि उसके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई प्रस्तावित है, ताकि वह अपना प्रभावी पक्ष रख सके.
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ब्लैकलिस्टिंग एक अत्यंत गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई है, क्योंकि इसके बाद संबंधित कंपनी भविष्य में सरकारी निविदाओं और अनुबंधों में भाग लेने से वंचित हो सकती है. इसलिए इस प्रकार की कार्रवाई करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और विधिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने अपने निर्णय में गोरखा सिक्योरिटी सर्विसेज बनाम दिल्ली सरकार, कुलजा इंडस्ट्रीज लिमिटेड, वेटइंडिया फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड सहित सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कारण बताओ नोटिस में ब्लैकलिस्टिंग का प्रस्ताव ही नहीं हो, तो बाद में ब्लैकलिस्टिंग का आदेश कानूनी रूप से टिक नहीं सकता.
हालांकि, अदालत ने कंपनी के अनुबंध समाप्त किए जाने के मुद्दे पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की. कोर्ट ने कहा कि अनुबंध की अवधि समाप्त हो चुकी है, इसलिए इस संबंध में कंपनी यदि चाहे तो सक्षम प्राधिकारी अथवा उचित न्यायिक मंच के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है.
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