- हाईकोर्ट ने मामले को वापस निचली अदालत में भेजा
- मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण करने का निर्देश
Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले के गोला अंचल स्थित डभातु गांव की 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़े छह प्रथम अपील मामलों में निचली अदालत के मुआवजा निर्धारण संबंधी फैसले को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने मामले को वापस निचली अदालत में भेजते हुए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने निचली अदालत को आदेश की प्रति प्राप्त होने के चार महीने के भीतर मामलों का फैसला करने को कहा है.
कोर्ट ने कहा है कि निचली अदालत ने पूर्व के फैसले में निर्धारित 8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर पर मुख्य रूप से भरोसा किया. लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि वर्तमान मामलों की जमीनों की परिस्थितियां उस मामले से किस प्रकार समान थीं. यह फैसला हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय प्रसाद ने सुनाया है. इन 6 अपीलों में तत्कालीन हजारीबाग (अब रामगढ़) के उपायुक्त ने डभातु गांव की जमीन के मुआवजे से संबंधित भू अर्जन (हजारीबाग) के विशेष जज द्वारा 29 फरवरी 2012 के फैसले को चुनौती दी थी.
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भैरवा जलाशय परियोजना के लिए हुआ था भूमि अधिग्रहण
मामला भैरवा जलाशय परियोजना के लिए डभातु गांव की 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है. भूमि अधिग्रहण की घोषणा 20 नवंबर 2003 को की गई थी, जिसे 2 दिसंबर 2003 को जिला गजट में प्रकाशित किया गया. कलेक्टर ने अधिग्रहित जमीन के लिए मुआवजे की दर निर्धारित की थी. जमीन मालिकों ने मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत आपत्ति दर्ज कराई थी.
भूमि मालिकों का दावा था कि जमीन की बाजार कीमत अधिक थी और भूमि की भविष्य की उपयोगिता, उपजाऊपन और व्यावसायिक संभावनाओं को ध्यान में नहीं रखा गया. उनका कहना था कि जमीन गोला शहर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है और आसपास बाजार, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, ब्लॉक कार्यालय, पावर स्टेशन, राष्ट्रीय राजमार्ग और अन्य सुविधाएं मौजूद हैं.
मुआवजा 8,923 रुपये प्रति डिसमिल किया गया था तय
भूमि अधिग्रहण न्यायालय ने पूर्व के एक मामले के फैसले को आधार बनाते हुए सभी संबंधित जमीनों के लिए एक समान दर से 8,923 रुपये प्रति डिसमिल मुआवजा निर्धारित किया था. इसी फैसले को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी. राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया.
सरकार ने यह भी कहा कि जमीन मालिकों ने अधिग्रहण के समय प्रचलित बाजार दर साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए थे. वहीं जमीन मालिकों की ओर से कहा गया कि सरकार ने 2002 में हुए कई भूमि सौदों में सबसे अधिक कीमत वाले सौदे को नजरअंदाज कर दिया और कम कीमत वाले सौदों के आधार पर मुआवजा तय किया.
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन में कमी पाई
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद पाया कि निचली अदालत ने 2002 में हुए 33 भूमि सौदों का उल्लेख तो किया, लेकिन उनके मूल्य और जमीन के क्षेत्रफल का उचित विश्लेषण नहीं किया. अदालत ने यह भी पाया कि राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेजों, विशेष रूप से बिक्री चार्ट और वैल्यूएशन खतियान, पर निचली अदालत ने पर्याप्त विचार नहीं किया.
पुराने दस्तावेजों की पठनीयता पर कोर्ट ने की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में शामिल कुछ दस्तावेजों की स्थिति पर भी नाराजगी जताई. अदालत ने पाया कि एक्सहिबिट-सी के कई पृष्ठ इतने छोटे थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था. एक्सहिबिट-डी भी स्पष्ट रूप से पढ़ने योग्य नहीं था. कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के रिकॉर्ड भेजते समय इन दस्तावेजों को उचित तरीके से उपलब्ध कराया जाना चाहिए था.
फैसला रद्द, चार माह में नए सिरे से निर्णय का निर्देश
हाईकोर्ट ने 29 फरवरी 2012 के फैसले और 15 मार्च 2012 को हस्ताक्षरित अवॉर्ड को रद्द कर दिया. मामलों को दोबारा उसी भूमि अधिग्रहण न्यायालय में भेजते हुए निर्देश दिया गया कि सभी उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार कर मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण किया जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत को आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार महीने के भीतर मामलों का निर्णय करना होगा.
इसके साथ ही छहों प्रथम अपीलों का निष्पादित कर दिया. हालांकि एक मामले में अपील आंशिक रूप से समाप्त किया गया. इसमें एक प्रतिवादी की मृत्यु के बाद उसके संबंध में अपील 12 सितंबर 2022 के आदेश से एबेट हो चुकी थी और उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाया गया था.
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