Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की एक अपील पर अपने आदेश में सख्त टिप्पणी की है. 289 दिन की देरी पर झारखंड सरकार की ओर से दायर अपील पर हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी तंत्र की लापरवाही, सुस्ती और फाइलों की अदला-बदली में देरी को माफ करने का आधार नहीं माना जा सकता.
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दायर अपील (LPA) को 289 दिन की देरी के कारण खारिज कर दिया है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया.
क्या है पूरा मामला
यह अपील झारखंड सरकार द्वारा एकल पीठ के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें 23 अगस्त 2013 की अधिसूचना को रद्द कर दिया गया था और याचिकाकर्ता संतोष कुमार सिंह को सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया गया था. राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ 289 दिन की देरी से अपील दाखिल की थी और देरी माफ करने के लिए इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन (I.A.) दायर की थी.
मामले में सरकार की ओर से कहा गया कि निर्णय की जानकारी विभाग को देरी से मिली. फाइल विभिन्न स्तरों पर घूमती रही, कानूनी राय लेने और अपील तैयार करने में समय लगा. इसलिए देरी जान-बूझकर नहीं की गई थी. हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि 5 महीने और 3 महीने की देरी का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.
देरी माफी का आधार नहीं
सिर्फ यह कहना कि फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल गई पर्याप्त कारण नहीं है. सरकार के लिए भी समय सीमा अवधि (Limitation Period) उतनी ही बाध्यकारी है. जितनी किसी आम नागरिक के लिए है.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही के कारण हुई देरी माफ करने का आधार नहीं हो सकती है.
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