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झारखंड रास चुनाव : क्या फिर होगा 2008 जैसा खेल? परिमल नाथवानी की एंट्री से बदले समीकरण

झारखंड राज्यसभा चुनाव में उस समय नया मोड़ आ गया, जब निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने नामांकन दाखिल कर दिया.  नाथवानी की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है. उन्होंने दावा किया है कि उनके पास 10 प्रस्तावकों का समर्थन है. लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए. भाजपा के समर्थन को लेकर भी उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, जिससे राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर तेज हो गया है.
 
  • नाथवानी के नामांकन से गरमाई झारखंड की सियासत
  • क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज
  • भाजपा का समर्थन या रणनीतिक दांव?

Ranchi : झारखंड राज्यसभा चुनाव में उस समय नया मोड़ आ गया, जब निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने नामांकन दाखिल कर दिया.  नाथवानी की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है.

 

उन्होंने दावा किया है कि उनके पास 10 प्रस्तावकों का समर्थन है. लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए. भाजपा के समर्थन को लेकर भी उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, जिससे राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर तेज हो गया है.

 

क्या है विधानसभा का गणित?

झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं और राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत है. महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, जिनमें झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक शामिल हैं.

 

वहीं एनडीए के पास 24 विधायक हैं. इसमें भाजपा के 21 और जदयू, आजसू व लोजपा के एक-एक विधायक शामिल हैं. हालांकि जेकेएलएम का एक विधायक अभी किसी खेमे में नहीं है. इस गणित के अनुसार, झामुमो के लिए अपना उम्मीदवार जिताना आसान है.

 

28 वोट देने के बाद भी उसके पास 6 अतिरिक्त वोट बचेंगे. अगर महागठबंधन एकजुट रहा तो कांग्रेस के लिए भी जीत के लिए जरूरी 28 वोट पूरे हो जाते हैं.

 

क्रॉस वोटिंग बन सकती है असली खेल

सबसे रोमांचक संभावना क्रॉस वोटिंग की है. भाजपा ने इस बार अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है और एनडीए के पास 24 वोट हैं  जीत से सिर्फ 4 कम. अगर भाजपा परोक्ष रूप से नाथवानी का समर्थन करती है और महागठबंधन में कुछ वोट इधर-उधर होते हैं, तो मुकाबला पूरी तरह पलट सकता है.

 

नाथवानी का झारखंड में पुराना इतिहास

यह पहली बार नहीं है, जब नाथवानी ने झारखंड की राजनीति को चौंकाया हो. 2008 के राज्यसभा चुनाव में प्रथम वरीयता में पिछड़ने के बावजूद नाथवानी ने दूसरी वरीयता के मतों से बाजी पलट दी थी और चुनाव जीत लिया था.

 

उस चुनाव में झामुमो के 17 विधायक होने के बावजूद उसके उम्मीदवार को सिर्फ 8 वोट मिले थे, जो क्रॉस वोटिंग की बड़ी मिसाल बनी. 2014 में भाजपा-आजसू के समर्थन से नाथवानी फिर निर्दलीय उम्मीदवार बने और विधानसभा के अंकगणित ऐसे बने कि वे और राजद के प्रेमचंद गुप्ता दोनों बिना टक्कर जीत दर्ज की.


अब सबसे बड़ा सवाल यही है

2026 में नाथवानी की वापसी ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. उनके 10 प्रस्तावक कौन हैं? क्या भाजपा फिर पर्दे के पीछे से उनका साथ दे रही है? इन्हीं सवालों के जवाब तय करेंगे कि यह चुनाव सामान्य रहेगा या झारखंड की राजनीति में एक और बड़ा उलटफेर लिखा जाएगा.

 

 

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