Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

किरीबुरु : खदान प्रबंधन ने डीएमएफटी फंड में दिए करोड़ों रुपए, लेकिन नहीं हुआ गांवों का विकास

Kiriburu (Shailesh Singh)झारखंड के खान निदेशक शंकर कुमार सिन्हा ने वर्ष 2021 में पश्चिम सिंहभूम जिले के उपायुक्त को पत्र लिखकर कहा था कि जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) का गठन राज्य के खनन प्रभावित क्षेत्र और वहां रहने वाले लोगों (विस्थापित सहित) के कल्याण के लिए गठित किया गया है. प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है. इसके क्रियान्वयन के लिए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट नियमों का पूर्ण अनुपालन किया जाना अति आवश्यक है. अतः पत्र द्वारा चिन्हित योजनाओं की सूची पर खान एवं भूतत्व विभाग से पूर्वानुमति प्राप्त करने के निर्देश को स्थगित किया जाता है. जो योजनाएं पीएमकेकेकेवाई नियमों के अन्तर्गत हैं, उन्हें चिन्हित कर स्वीकृति एवं क्रियान्वयन जिला स्तर पर जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट नियमों और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के नियमों एवं प्रावधानों के अनुरूप किये जाने का निर्देश दिया जाता है. डीएमएफटी निधि हेतु स्वीकृत की गयी योजनाओं की विवरणी प्रत्येक तिमाहीवार खान एवं भूतत्व विभाग को उपलब्ध कराई जाये. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/10/Kiriburu-Letter-1-750x536.jpg"

alt="" width="750" height="536" /> इसे भी पढ़ें : आदित्यपुर:">https://lagatar.in/adityapur-a-50-bed-night-shelter-will-be-built-near-the-sun-temple-in-ward-28-from-70-lakhs/">आदित्यपुर:

वार्ड-28 में सूर्य मंदिर के पास 70 लाख से बनेगा 50 बेड का रैन बसेरा

सारंडा में चार बड़ी खदानें हैं

https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/10/Kiriburu-Khadan-1.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> सारंडा में स्थित सेल की चार बड़ी खदानें किरीबुरु, मेघाहातुबुरु, गुवा एवं चिड़िया, टाटा स्टील की टीएसएलपीएल खदान होने के बावजूद सारंडा में चिकित्सा की कोई बेहतर सुविधा नहीं होना सारंडा के ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों एवं राज्य सरकार के लिये अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. सारंडा में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पैसा अथवा फंड की कोई कमी नहीं है, कमी है तो बस बेहतर इच्छा शक्ति की. उल्लेखनीय है कि सेल की किरीबुरु, मेघाहातुबुरु एंव गुवा खादान प्रबंधन प्रतिवर्ष लगभग 100-120 लाख टन (प्रत्येक खदान का उत्पादन 35-40 लाख टन) अयस्क का उत्पादन जबकि चिड़िया खदान प्रबंधन लगभग तीन-चार लाख टन उत्पादन करती है. इस उत्पादन के एवज में सेल की चारों खदान प्रबंधन पश्चिम सिंहभूम की डीएमएफटी फंड में प्रतिवर्ष लगभग एक हजार करोड़ रुपए वर्ष 2011-12 से देता आ रहा है. इसके अलावे टाटा स्टील की टीएसएलपीएल एवं नोवामुंडी खदान प्रबंधन और सारंडा की अन्य प्राईवेट खदानें भी सैकड़ों करोड़ रुपए प्रति वर्ष डीएमएफटी फंड में देती है. यह पैसा खदान प्रबंधन खदान से प्रभावित सारंडा के गांवों का सर्वांगीण विकास जैसे बेहतर चिकित्सा, शिक्षा, पेयजल, सड़क, बिजली, यातायात, रोजगार आदि सुविधाएं बहाल करने के लिए देता है. किन दुर्भाग्य की बात है कि आज तक इनमें से कोई भी सुविधा बेहतर तरीके से सारंडा में बहाल नहीं की जा सकी है. इसे भी पढ़ें : बहरागोड़ा:">https://lagatar.in/baharagora-khandamoda-bad-bad-road-turned-into-potholes-inviting-accidents-every-step-of-the-way/">बहरागोड़ा:

पग-पग पर दुर्घटना को आमंत्रित करती गड्ढों में तब्दील खंडामौदा-बदबती सड़क

डीएमएफटी फंड से सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाया जा सकता है

जानकार बताते हैं कि सरकार और प्रशासन अगर ईमानदारी पूर्ण प्रयास करती तो सारंडा जोन में कहीं भी सुपर स्पेशलिटी सरकारी अस्पताल बनाया जा सकता था. इस पर लगभग पांच सौ करोड़ रुपए की लागत आती. इस खर्च में पांच सौ से एक हजार बेड क्षमता का अस्पताल बड़ाजामदा या सारंडा क्षेत्र के किसी कॉमन स्थान पर बनाकर सारंडा और आसपास के लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा निःशुल्क या न्यूनतम दर पर उपलब्ध कराई जा सकती थी. उक्त अस्पताल के डॉक्टरों व स्टाफ आदि का खर्च प्रति वर्ष डीएमएफटी फंड में खदान प्रबंधनों द्वारा दी जाने वाली हजारों करोड़ रुपए सरकार वहन कर सकती है. दुर्भाग्य की बात है कि सारंडा में सेल की किरीबुरु-मेघाहातुबुरु (लगभग एक सौ बेड क्षमता), गुवा (लगभग 50-60 बेड) एंव चिडि़या अस्पताल को छोड़ एक भी ऐसा अस्पताल नहीं है जहां 24 घंटे मरीजों को प्रारम्भिक इलाज उपलब्ध हो सके. इसे भी पढ़ें : गोवा">https://lagatar.in/goa-mig-29k-fighter-of-indian-navy-crashes-crashes-over-sea/">गोवा

: भारतीय नौसेना का मिग-29K फाइटर दुर्घटनाग्रस्त, समुद्र के ऊपर हुआ क्रैश

गांवों का विकास नहीं होने से ग्रामीण करते हैं आंदोलन

डीएमएफटी फंड से खदानों से प्रभावित गांवों का विकास नहीं होने की वजह से सबसे ज्यादा परेशान खदान प्रबंधन हैं. गांवों का विकास नहीं होने से खदान प्रबंधनों को खदान व उत्पादन बंद जैसे आंदोलन का सामना करना पड़ रहा है. इससे खदान प्रबंधनों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. सूत्रों अनुसार पिछली तिमाही में टीएसएलपीएल खदान प्रबंधन को लगभग 350 करोड़ रूपये का घाटा हुआ है. ग्रामीणों द्वारा बार बार खदान को बंद कराने से टीएसएलपीएल खदान प्रबंधन त्रस्त हो चुकी है. [wpse_comments_template]

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही