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कांके अंचल की मझीहस जमीन पर भू-माफियाओं की नजर, ऑनलाइन रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर करोड़ों की जमीन बेची

झारखंड की राजधानी रांची की खबरें

Ranchi :  राजधानी रांची का कांके अंचल लंबे समय से भूमि विवाद और भू-माफियाओं की गतिविधियों को लेकर चर्चा में रहा है. यहां प्रभावशाली जमीन कारोबारियों और भू-माफियाओं की मिलीभगत से भूईहरी, मझीहस, जंगल-झाड़ी और जलस्रोतों से जुड़ी जमीनों के रिकॉर्ड में लगातार छेड़छाड़ कर अवैध खरीद-बिक्री का खेल चल रहा है.

 

ताजा मामला मझीहस जमीन से जुड़ा है, जिसमें झारभूमि पोर्टल के ऑनलाइन रिकॉर्ड में कथित हेरफेर कर करोड़ों रुपये के मूल्य की जमीन की रजिस्ट्री कराने का आरोप लगाया गया है. मामला कांके अंचल के संग्रामपुर मौजा स्थित खाता संख्या-1 से संबंधित है.  नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) द्वारा संचालित झारभूमि सॉफ्टवेयर के भूमि रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ कर लगभग 1 एकड़ 77.5 डिसमिल मझीहस जमीन की खरीद-बिक्री की गई है. 

 

जानकारी के अनुसार, प्लॉट संख्या 456 (54.50 डिसमिल), 455 (26.25 डिसमिल), 454 (12 डिसमिल), 453 (13.50 डिसमिल), 451 (6 डिसमिल), 450 (1.75 डिसमिल), 447 (12 डिसमिल), 445 (3.50 डिसमिल), 443 (23 डिसमिल) और 442 (25 डिसमिल) सहित कुल 1 एकड़ 77.5 डिसमिल भूमि ऑनलाइन रिकॉर्ड में मझीहस मालिक के रूप में दर्ज थी. रिकॉर्ड में कथित बदलाव के बाद 8 अप्रैल 2021 को इस भूमि की रजिस्ट्री कर दी गई.

 

दस्तावेजों के अनुसार, इस जमीन के विक्रेता के रूप में रूबी दत्ता, राजा दत्ता और आलो दत्ता का नाम दर्ज है, जिनका पता पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का बताया गया है. वहीं खरीदार के रूप में दिल्ली निवासी रोहित जैन का नाम सामने आया है. बताया जाता है कि यह जमीन लगभग 1 करोड़ 48 लाख रुपये में बेची गई.

 

 

क्या है मझीहस जमीन का कानूनी दर्जा

भूमि विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 1869 से 1880 के बीच छोटानागपुर क्षेत्र के हजारों मौजों की भूईहरी सर्वे के दौरान मझीहस भूमि की पहचान की गई थी. उस समय तत्कालीन जमींदार इस भूमि को आटबटाई पर खेती के लिए देते थे. बाद में छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम, 1908 लागू होने पर इसे विशेष श्रेणी की भूमि (प्रिविलेज लैंड) के रूप में दर्ज किया गया.

 

जमींदारी उन्मूलन के बाद भी अधिकांश मझीहस भूमि का विधिवत लगान निर्धारण नहीं हो सका. तत्कालीन जमींदारों ने भूमि सुधार प्रक्रिया के दौरान इस भूमि को अपने एम-फॉर्म में दर्ज नहीं कराया, जिसके कारण इसका राजस्व रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हो पाया. वर्ष 1962 में भूमि हदबंदी कानून लागू होने के बावजूद इस श्रेणी की कई जमीनों का राजस्व निर्धारण आज तक लंबित है.

 

 

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