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MMTTC रांची में भारतीय जीवन-शैली पर प्रो. प्रकाश सहाय का प्रेरक व्याख्यान

Ranchi : UGC मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग सेंटर (MMTTC), रांची विश्वविद्यालय में संचालित Inter/Multi-disciplinary Refresher Course in Social Sciences के अंतर्गत आयोजित सत्र में प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. प्रकाश सहाय ने “भारतीय जीवन-शैली : लाख दुखों की एक दवा (IKS के संदर्भ में)” विषय पर विचार रखे. इस सत्र में देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 60 शिक्षक-प्रतिभागियों ने सहभागिता की.

 

अपने व्याख्यान में प्रो. सहाय ने कहा कि शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए Teaching Enrich की भावना आवश्यक है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक अच्छे शिक्षक की पहचान उसकी मौलिक सोच से होती है.

 

अनुभव से निकले विचार, सरल भाषा और सहज प्रस्तुति ही विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करती है. रटी-रटाई शिक्षा की आलोचना करते हुए उन्होंने इसे “पिंजरे के पंछी” के समान बताया, जो सृजनशीलता और स्वतंत्र चिंतन को सीमित कर देती है.

 

प्रो. सहाय ने शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण पर बोलते हुए कहा कि बाहरी आडंबर से अधिक आंतरिक गुण, संवेदना और परहित की भावना का महत्व है. उन्होंने तुलसीदास की काव्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए नैतिकता और मानवीय मूल्यों को शिक्षा का केंद्र बताया.

 

रामराज्य की अवधारणा को नैतिक शासन से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि आदर्श व्यवस्था तभी संभव है, जब नेतृत्व भरत जैसे त्यागी और कर्तव्यनिष्ठ हों.

 

उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक भ्रष्टाचार से अधिक घातक सामाजिक और सांस्कृतिक भ्रष्टाचार होता है, क्योंकि यह समाज की मूल चेतना को कमजोर करता है.

 

भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय स्त्री केवल भोजन नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और संस्कार भी देती है, जो परिवार और समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं.

 

झारखंड के विकास के संदर्भ में उन्होंने बेड़ो–रड़गांव क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थानीय संसाधनों के बावजूद ठोस योजनाओं के अभाव में कृषि उत्पादों का समुचित लाभ नहीं मिल पाता.

 

उन्होंने सुझाव दिया कि यदि नीति स्तर पर पत्तल में भोजन परोसने जैसे निर्णय लिए जाएं, तो वन-आधारित अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है.

 

वैदिक ज्ञान-परंपरा पर बोलते हुए प्रो. सहाय ने कहा कि चारों वेदों का सार भारतीय जीवन-शैली में निहित है. वैदिक गणित, आयुर्वेद और शून्य की अवधारणा को उन्होंने प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक चेतना के महत्वपूर्ण उदाहरण बताया.

 

रामायण के विभिन्न पात्रों के माध्यम से उन्होंने कर्तव्य, त्याग, सेवा, निष्ठा और विवेक जैसी जीवन-मूल्यों की व्याख्या की और कहा कि रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की संहिता है.

 

व्याख्यान के अंत में उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन-शैली अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और नैतिकता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. प्रतिभागी शिक्षकों ने सत्र को अत्यंत उपयोगी, सरल और प्रेरणादायी बताया.

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