- आदिवासी जुटान में राहुल गांधी के कटआउट पर उठे सवाल
- मंच पर नहीं दिखा आदिवासी नेतृत्व
Ranchi News: राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान रैली को लेकर झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के संस्थापक पुष्कर महतो ने कई सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने दावा किया कि कार्यक्रम में झारखंड के 24 जिलों से करीब 5 लाख लोगों के जुटने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन उनके अनुसार मौके पर लगभग 10 से 15 हजार लोग ही पहुंचे.
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पुष्कर महतो ने कहा कि रैली में शामिल लोगों के बीच भी यह चर्चा रही कि अपेक्षा के अनुरूप भीड़ नहीं जुट पाई. उनके मुताबिक राजधानी रांची में इतने बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित होने के बावजूद भीड़ अनुमान से काफी कम रही.
उन्होंने कहा कि मंच से कार्यक्रम को सफल बताया गया, लेकिन यदि पूरे कार्यक्रम की तस्वीरों और मैदान में मौजूद भीड़ को ध्यान से देखा जाए तो स्थिति अलग नजर आती है. पुष्कर महतो का आरोप है कि कार्यक्रम में कांग्रेस और झामुमो से जुड़े लोगों की मौजूदगी अधिक दिखाई दी, जिसके कारण इसे लेकर भी सवाल उठे.
पुष्कर महतो ने मोरहाबादी मैदान में लगाए गए राहुल गांधी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कटआउट को लेकर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि यदि यह वास्तव में आदिवासी एकता का महाजुटान था तो मैदान की सजावट में धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे आदिवासी नायकों के चित्र और कटआउट अधिक दिखाई देने चाहिए थे.
उन्होंने कहा कि आदिवासी महापुरुषों के बजाय राजनीतिक नेताओं के कटआउट लगाए जाने से कार्यक्रम की मूल भावना को लेकर लोगों के मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है.
पुष्कर महतो ने कहा कि कार्यक्रम में राहुल गांधी के शामिल होने की संभावनाओं की चर्चा थी, लेकिन उनके रांची नहीं आने और कार्यक्रम में शामिल नहीं होने को लेकर भी लोगों में नाराजगी देखने को मिली.
उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन के मुद्दे को लेकर वास्तव में बड़ा आंदोलन खड़ा करना था तो राहुल गांधी की मौजूदगी कार्यक्रम में होनी चाहिए थी. उनके मुताबिक राहुल गांधी के आने से कार्यक्रम में लोगों की भागीदारी और भी बढ़ सकती थी.
पुष्कर महतो ने मंच पर मौजूद नेताओं को लेकर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि कार्यक्रम को आदिवासी एकता के नाम पर आयोजित किया गया, लेकिन मंच पर झामुमो और कांग्रेस से जुड़े कई नेता नजर आए. उन्होंने सवाल किया कि यदि यह आदिवासी समाज का महाजुटान था तो मंच पर मूल आदिवासी नेतृत्व को पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला?
उन्होंने कार्यक्रम में शामिल नेताओं के सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि मंच पर मौजूद कुछ प्रमुख चेहरे अलग-अलग धार्मिक समुदायों से आते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज की ओर से मध्य प्रदेश से आए आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया, लक्ष्मीकांत मुंडा समेत कुछ अन्य चेहरे दिखाई दिए.
महाजुटान के दौरान बीजेपी और आरएसएस को लेकर भी नेताओं के भाषण में चर्चा हुई. पुष्कर महतो के अनुसार, कार्यक्रम में कहा गया कि बीजेपी पर अक्सर धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश करने का आरोप लगाया जाता है. नेताओं ने आदिवासी समाज से एकजुट रहने और ऐसे किसी भी राजनीतिक बहकावे में नहीं आने की अपील की.
वहीं, पुष्कर महतो के अनुसार कांग्रेस नेता सुखदेव भगत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आदिवासियों को कथित तौर पर ‘वनवासी’ कहे जाने पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि “हम आदिवासी हैं, वनवासी नहीं. आदिवासी का मतलब मूलनिवासी होता है, जबकि वनवासी का अर्थ जंगल में रहने वाला होता है.”
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