Ranchi : झारखंड की 9 जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के पुनरुद्धार, संरक्षण और संवर्धन को लेकर सरकार से ठोस पहल करने की मांग की गई. शनिवार को रांची विश्वविद्यायल के दीक्षांत मंडप में जनजातीय एवं क्षेत्रिय भाषा बचाओ मोर्चा के बैनर तले कनक्लेव 2.0 का आगाज किया गया. जहां पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की कार्यक्रम के संरक्षक थे.
इस दौरान शिक्षाविद्, साहित्यकार, शोधार्थी और छात्रों ने कहा कि झारखंड केवल खनिज संपदा का प्रदेश नहीं, बल्कि समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई विरासत का केंद्र भी है. कुंडुख, खड़िया, हो, मुंडारी, संताली, कुरमाली, खोरठा, नागपुरी और पंचपरगनिया जैसी भाषाएं राज्य की पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता की आधारशिला हैं.

वैश्वीकरण और अंग्रेजी-हिंदी के बढ़ते प्रभाव के कारण इन भाषाओं का अस्तित्व संकट में है. नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा बोलने से संकोच कर रही है, जबकि शहरीकरण के चलते परिवारों में भी मातृभाषाओं का प्रयोग लगातार कम हो रहा है. इससे बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों और लोक परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं.
इसमें यूनेस्को का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भाषा के समाप्त होने का अर्थ केवल एक संचार माध्यम का खत्म होना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियां, लोककथाएं, पारंपरिक ज्ञान, औषधीय जानकारी और जीवन दृष्टि का भी लुप्त हो जाना है. झारखंड की इन भाषाओं में निहित ज्ञान और परंपराएं राज्य की अमूल्य धरोहर हैं.
प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक इन भाषाओं को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया है. रोजगार के सीमित अवसर और प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा के कारण अभिभावक भी बच्चों को मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने को प्राथमिकता दे रहे हैं. वहीं, डिजिटल युग में इन भाषाओं की ऑनलाइन उपस्थिति भी बेहद सीमित है.
कुलपति डॉ शरोज शर्मा ने कहा कि आदिवासी भाषाओं के लिए सजग है. रांची विश्वविद्यालय में नौ भाषाओ में पढाई होती है. इसे राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के लिए सर्टिफिकेट कोर्स की शुरूआत भी होनी चाहिए. इसके अलावा प्राथमिक स्तर पर भी झारखंड की 9 भाषाओं में पढाई होनी चाहिए.
इनकी ये मांगे है
-9 जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारी नीति बनाई जाए.
-प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा आधारित शिक्षा व्यवस्था का प्रभावी किया जाए.
-जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के शिक्षकों की नियमित नियुक्ति सुनिश्चित की जाए.
-सरकारी कार्यालयों और जनसेवाओं में इन भाषाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए.
-साहित्य, लोककला, शोध, प्रकाशन और डिजिटल माध्यमों में इन भाषाओं को प्रोत्साहन दिया जाए.
-प्रत्येक जिले में भाषा एवं संस्कृति केंद्र की स्थापना की जाए.
-युवाओं को अपनी मातृभाषा से जोड़ने के लिए विशेष अभियान और कार्यक्रम संचालित किए जाएं.
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