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रांची नगर निगम की मनमानी पर हाईकोर्ट की रोक, बिना कारण बताए लाइसेंस रद्द करने का आदेश खारिज

Ranchi :  कोर्ट ने कहा कि नगर निगम याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देकर, उनके तर्क और दस्तावेजों पर विचार करते हुए तर्कसंगत आदेश पारित करेगा. यह प्रक्रिया आदेश की प्रति मिलने के 12 सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी. तब तक याचिकाकर्ताओं का कब्जा नहीं हटाया जाएगा. याचिकाकर्ताओं को निगम के समक्ष उपस्थित होकर सहयोग करना होगा.
 
हाईकोर्ट
  • निगम के आदेश "कर्कश", जो कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं : हाईकोर्ट

Ranchi :  झारखंड हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम द्वारा अपर बाजार के जालान रोड स्थित भूखंड व दुकानों का लाइसेंस (लीज) रद्द करने और उन्हें खाली कराने के आदेशों को रद्द कर दिया है. न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने कहा है कि निगम के आदेश "कर्कश" यानी बिना कारण वाले थे, जो कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं हैं. मामला अब नगर निगम को वापस भेज दिया गया है. हाईकोर्ट ने किरण देवी मोदी सहित 8 रिट याचिकाओं को स्वीकार करते याचिका निष्पादित कर दी.

 

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जानें क्या है मामला

दरअसल वर्ष 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने वार्ड संख्या 5 के सर्वे प्लॉट संख्या 732 पर 5100 वर्ग फुट जमीन मोहन लाल कतची को आवंटित की थी, जहां वे टेंट हाउस का कारोबार करते थे. उनके निधन के बाद पुत्र महेंद्र कुमार कतची ने वर्ष 2000 में मोदी परिवार के सुरेश कुमार मोदी और रमेश कुमार मोदी के साथ साझेदारी की. बाद में साझेदारी समाप्त हुई और जमीन मोदी बंधुओं के पक्ष में सरेंडर कर दी गई.

 

नगर निगम ने 9 दिसंबर 2003 को यह जमीन उनके नाम आवंटित की और 5 जून 2004 को समझौता हुआ. निगम ने 6 अगस्त 2004 को पक्का निर्माण करने की अनुमति भी दी. इसके बाद दुकानें बनीं और मोदी परिवार ने निगम से आग्रह किया कि दुकानें शेष सात याचिकाकर्ताओं के नाम पर पुनः आवंटित कर दी जाएं.

 

9 सितंबर 2014 को निगम ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और 14 अक्टूबर 2014 को लाइसेंस (लीज) रद्द कर दिया. 4 दिसंबर 2014 को दुकानें खाली करने का आदेश दिया गया. हाईकोर्ट के निर्देश पर याचिकाकर्ताओं ने निगम को आवेदन दिया, जिसे सीईओ ने 13 फरवरी 2015 को खारिज कर दिया.

 

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने कहा कि आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया और उनके तथ्यों पर विचार ही नहीं हुआ. वहीं निगम के अधिवक्ता ने कहा कि लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन हुआ है और यह उप-किराएदारी (सब-लेटिंग) का मामला है. उन्होंने यह भी कहा कि निगम को स्वयं विकास कार्य के लिए जमीन की जरूरत है.

 

कोर्ट ने पाया कि 14 अक्टूबर 2014 का आदेश मात्र तीन पंक्तियों का है और उसमें कोई कारण दर्ज नहीं है. 13 फरवरी 2015 का आदेश भी केवल पुरानी बातें दोहराता है. हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के तीनों आदेश रद्द कर दिए.

 

कोर्ट ने कहा कि नगर निगम याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देकर, उनके तर्क और दस्तावेजों पर विचार करते हुए तर्कसंगत आदेश पारित करेगा. यह प्रक्रिया आदेश की प्रति मिलने के 12 सप्ताह के भीतर पूरी करनी होगी. तब तक याचिकाकर्ताओं का कब्जा नहीं हटाया जाएगा. याचिकाकर्ताओं को निगम के समक्ष उपस्थित होकर सहयोग करना होगा.

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