Ranchi: बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक युवा अधिवक्ता द्वारा स्वयं पक्ष रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के बेंच के समक्ष उन्हें पब्लिक सर्वेंट कहते हुए अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर दस्तावेज उछालना चर्चा का विषय बना हुआ है. चर्चा सिर्फ इस बात की है कि युवा अधिवक्ता प्रबल प्रताप ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच के समक्ष अपना गुस्सा या फ्रस्ट्रेशन क्यों निकाला? चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ क्यों अपशब्द कहे और किन परिस्थितियों में कहे.
उसने अपने व्यवहार से न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचने की चेष्टा क्यों की. सुप्रीम कोर्ट ने बड़प्पन दिखाते हुए उसपर एक्शन नहीं लिया, लेकिन न्यायपालिका के समक्ष भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृति न हो इस पर मंथन होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में घटी यह अप्रत्याशित घटना निश्चित तौर पर निंदनीय है. लेकिन युवा अधिवक्ता द्वारा उठाया गया यह बड़ा कदम न्यायपालिका पर विश्वास रखने वालों के लिए नई चिंता का कारण भी बन गया है.
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Lagatar.in ने ली अधिवक्ताओं की राय
इन्हीं मुद्दों पर lagatar.in ने अधिवक्ताओ से बातचीत की. झारखंड हाईकोर्ट के वरीय अधिवक्ता जेपी झा ने कहा कि एक अधिवक्ता का इन पर्सन होकर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान अमर्यादित आचरण निश्चित तौर पर पीड़ा देने वाला है. अपशब्द कहने का अधिकार उस युवा अधिवक्ता को किसने दिया? अगर आपको कोई ग्रीवेंस था तो कोर्ट के समक्ष संयमित ढंग से इस बात को रखा जा सकता था.

संसद में भी पार्लियामेंट्री प्रोसीजर है जिसके तहत वहां भाषा का प्रयोग किया जाता है. न्यायपालिका में भी अधिवक्ताओं को अपनी बातों को रखने का व्यवस्थित और अनुशासित नियम बनाया गया है. इसका पालन नहीं करने वाले कोर्ट की अवमानना के दायरे में आते हैं. मानसिक रूप से विक्षुब्ध उस युवा अधिवक्ता को सीख देने के लिए उसे दंडित किया जाना चाहिए था.
झारखंड के पूर्व महाधिवक्ता एवं वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि अदालतों में इन पर्सन रूप में बहस करने वाले के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP ) होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट में युवा अधिवक्ता द्वारा किया गया आचरण निंदनीय है. ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए न्यायपालिका को कड़े कदम उठाने की जरूरत है.

युवा अधिवक्ता को उसके द्वारा किए गए अमर्यादित बहस और जजों के खिलाफ किए गए टिप्पणी के लिए दंड देना अनिवार्य था, ताकि ऐसी घटना फिर से ना हो. ऐसी घटनाएं टॉलरेट नहीं की जानी चाहिए, युवा अधिवक्ता का आचरण मर्यादा के खिलाफ था.
झारखंड स्टेट बार काउंसिल के सदस्य एवं हाई कोर्ट के अधिवक्ता एके रसीदी ने कहा की अदालत में बेंच और बार का संबंध काफी बेहतर संबंध रहना चाहिए. युवा अधिवक्ता द्वारा यह अप्रत्याशित घटना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसी घटनाओं से बेंच और बार के बीच का संबंध खटास की ओर जाता है. सुप्रीम कोर्ट में युवा अधिवक्ता का व्यवहार न्यायालय, न्याय और न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध है.

युवा अधिवक्ता पर कार्रवाई जरूरी है अन्यथा ऐसी घटनाएं बढ़ती जाएगी और भविष्य में यह गंभीर रूप ले सकता है. न्यायपालिका पर पूरे देश की निगाह रहती है यह जनता का न्याय पाने का अंतिम जगह माना जाता है. ऐसे में यहां अधिवक्ताओं का व्यवहार संविधान और कानून के अनुसार सभ्य होना चाहिए.
रांची सिविल कोर्ट के अधिवक्ता एवं जिला बार एसोसिएशन के महासचिव संजय विद्रोही ने कहा कि यह घटना निंदनीय है. ऐसी घटना क्यों हुई इसके जड़ में जाने की जरूरत है. शायद युवा अधिवक्ता को उसकी शिकायत का निदान सरकारी कार्यालय में अधिकारियों या कर्मचारी के संवाद से नहीं मिला होगा, जिससे वह विचलित रहा होगा.

आज समाज में भ्रष्टाचार व्यवस्था का औपचारिक नियम बन गया है. सरकारी अधिकारी आम जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं. ऐसे में कोई खुद को मानसिक प्रताड़ित महसूस करते हुए अशोभनीय आचरण कर बैठता है, लेकिन वह यह नहीं देखता है कि वह किस जगह अपनी भड़ास निकाल रहा है. कोर्ट में जजों के प्रति संयमित भाषा का प्रयोग होना जरूरी है.
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