- पीढ़ियों से आदिवासी समाज का रहा है हिस्सा
Ranchi News : झारखंड के जंगल सिर्फ लकड़ी और वन उपज का खजाना नहीं, बल्कि यहां की अनोखी खान-पान परंपराओं का भी आधार हैं. आदिवासी बहुल इलाकों में आज भी प्रकृति से मिलने वाली चीजों से कई पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं. इनमें लाल चींटियों से बनने वाली चटनी खास पहचान रखती है. रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम समेत कई क्षेत्रों में यह वर्षों से स्थानीय भोजन का हिस्सा रही है.
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पेड़ों पर दिखते हैं लाल चींटियों के घोंसले
सर्दी शुरू होते ही जंगलों में साल, करंज और दूसरे पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर लाल चींटियों के घोंसले नजर आने लगते हैं. चींटियां पत्तियों को जोड़कर घोंसले बनाती हैं. ग्रामीण इनकी आवाजाही देखकर घोंसलों की पहचान करते हैं. सावधानी से उन्हें टहनियों समेत नीचे उतारते हैं. पेड़ों की ऊंचाई और चींटियों के काटने के कारण यह काम जोखिम भरा भी होता है.
सिलौट पर पीसकर तैयार होती है चटनी
घोंसले से चींटियों को अलग करने के बाद पारंपरिक तरीके से चटनी बनाई जाती है. पत्थर की सिलौट पर लाल चींटियों को नमक, मिर्च, अदरक और लहसुन के साथ पीसा जाता है. कई जगह स्थानीय सामग्री भी इसमें मिलाई जाती है. तैयार चटनी को अक्सर साल के पत्ते पर परोसने की परंपरा है.
खाने से ज्यादा सांस्कृतिक विरासत
लाल चींटियों में मौजूद प्राकृतिक अम्लीय तत्व चटनी को खास खट्टापन देते हैं. मिर्च और मसालों के साथ इसका स्वाद तीखा हो जाता है. स्थानीय लोगों के बीच सर्दियों में इसकी मांग बढ़ने की बात कही जाती है. आदिवासी समाज में यह चटनी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जंगल और समुदाय के रिश्ते की पहचान भी है.
स्थानीय मान्यताओं में इसे सर्दियों में उपयोगी माना जाता है और इसमें प्रोटीन समेत पोषक तत्व होने की चर्चा भी होती है. हालांकि, किसी बीमारी के इलाज के लिए इसे चिकित्सकीय विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
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