- कोर्ट ने 1.71 करोड़ रुपये के बकाये पर दिया आदेश
- 24 किसानों के मामले में जांच चार महीने में पूरी करने का निर्देश
Ranchi News: झारखंड हाइकोर्ट ने पलामू जिला के पंडवा प्रखंड में धान खरीद के बकाये भुगतान मामले में 104 किसानों को बड़ी राहत दी है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जिन 104 किसानों पर धान खरीद में अनियमितता का कोई आरोप नहीं है, उन्हें बकाया राशि का भुगतान करने के लिए दो महीने के भीतर हाईकोर्ट में राशि जमा करायी जाये. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन किसानों को धान की आपूर्ति के बदले पहले ही 50 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है और उनके पास आपूर्ति की रसीद भी है. ऐसे में बिना किसी ठोस आधार के उनका शेष भुगतान रोका नहीं जा सकता.
अदालत ने शेष 24 किसानों के मामले में राज्य सरकार को जांच करने की छूट दी है. सरकार को एक महीने के भीतर जांच की प्रक्रिया शुरू करनी होगी और उसके बाद अधिकतम चार महीने में इसे पूरा करना होगा. यदि इन किसानों के खिलाफ निर्धारित समय में कार्रवाई शुरू नहीं होती या जांच पूरी नहीं की जाती है, तो उन्हें भी बकाया राशि का भुगतान करना होगा. अदालत ने यह आदेश आशा प्रसाद की ओर से दायर जनहित याचिका पर दिया.
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128 किसानों का लगभग 1.71 करोड़ रुपये था बकाया
याचिका में बताया गया था कि पंडवा प्रखंड के पात्रा पैक्स के माध्यम से किसानों ने सरकार को धान की आपूर्ति की थी. इसके बदले किसानों को 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किया गया, लेकिन शेष 50 प्रतिशत यानी लगभग 1.71 करोड़ रुपये का भुगतान लंबे समय से लंबित था. किसानों को भुगतान नहीं होने के मामले में हाइकोर्ट ने 10 जुलाई 2024 को राज्य सरकार के आश्वासन के बाद बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था.
उस समय राज्य सरकार की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया था कि अगस्त 2024 के पहले सप्ताह तक किसानों को शेष राशि का भुगतान कर दिया जायेगा. कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी थी कि भुगतान नहीं होने पर संबंधित विभाग के सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जा सकती है. हालांकि इसके बावजूद भुगतान नहीं हुआ.
जांच में धान खरीद में अनियमितता की बात आयी सामने
राज्य सरकार ने बाद में हाइकोर्ट में आवेदन दाखिल कर 10 जुलाई 2024 के आदेश को वापस लेने या उसमें संशोधन करने का आग्रह किया. सरकार की ओर से बताया गया कि उपायुक्त, पलामू की जांच रिपोर्ट में पात्रा पैक्स के माध्यम से धान खरीद में कई अनियमितताएं सामने आयी हैं.
जांच रिपोर्ट के अनुसार, पैक्स के पास 8,356.80 क्विंटल धान के भंडारण के लिए पर्याप्त क्षमता नहीं थी. इसके अलावा एक दिन में धान खरीद की सामान्य क्षमता से अधिक खरीद दिखायी गयी थी.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 24 किसानों ने अपनी जमीन के रकबे और औसत उत्पादकता के मुकाबले अधिक मात्रा में धान बेचा था. कुछ मामलों में एक ही जमीन के आधार पर एक से अधिक किसानों द्वारा धान बेचने का उल्लेख किया गया.
सरकार ने आरोप लगाया कि पात्रा पैक्स के अध्यक्ष, तत्कालीन खरीद पदाधिकारी और कुछ किसानों की मिलीभगत से वास्तविक खरीद से अधिक धान की खरीद दिखायी गयी. इस मामले में मनोज कुमार मिश्रा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के साथ विभागीय कार्रवाई और 1.71 करोड़ रुपये की वसूली की प्रक्रिया शुरू करने की भी जानकारी दी गयी.
104 किसानों को बकाये से वंचित करना उचित नहीं
कोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट में करीब 128 किसानों में से केवल 24 किसानों के खिलाफ अनियमितता में शामिल होने के आरोप लगाये गये हैं. इन आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई है. शेष 104 किसानों के खिलाफ कोई आरोप नहीं है. ऐसे में कुछ किसानों पर लगे आरोपों के आधार पर सभी किसानों का भुगतान रोकना उचित नहीं है.
खंडपीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार की ओर से पहले ही अदालत को भुगतान का स्पष्ट आश्वासन दिया गया था. इसके बावजूद लंबे समय तक भुगतान नहीं हुआ और जांच तथा आपराधिक कार्रवाई में भी कोई खास प्रगति नहीं दिखायी गयी. अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कथित अनियमितताओं का पता पहले क्यों नहीं चला और भुगतान का आश्वासन दिये जाने के बाद ही ये आरोप क्यों सामने आये.
बैंक खातों में सीधे भेजी जायेगी राशि
हाइकोर्ट ने निर्देश दिया कि 104 किसानों के बकाये की राशि दो महीने के भीतर अदालत में जमा करायी जाये. इसके बाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री सीधे किसानों के बैंक खातों में राशि हस्तांतरित करेगी. इसके लिए याचिकाकर्ता को किसानों की पहचान और बैंक खाते से संबंधित विवरण रजिस्ट्री को उपलब्ध कराना होगा.
शेष 24 किसानों के संबंध में अदालत ने कहा कि उन्हें उचित नोटिस देकर जांच की जाये. यदि वे अनियमितता में संलिप्त पाये जाते हैं, तो नियमानुसार उनके भुगतान से इनकार करने का आदेश पारित किया जा सकता है. ऐसे किसानों को संबंधित आदेश को कानून के अनुसार चुनौती देने की स्वतंत्रता होगी. यदि वे दोषी नहीं पाये जाते हैं, तो उनकी बकाया राशि भी जारी करनी होगी.
विभागीय सचिव होंगे आदेश के अनुपालन के लिए जिम्मेदार
अदालत ने खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग के सचिव को आदेश के अनुपालन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया है. सचिव को सात दिसंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल करनी होगी. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को भी रिपोर्ट की अग्रिम प्रति देनी होगी.
मामले में अनुपालन की स्थिति की समीक्षा के लिए कोर्ट ने 10 दिसंबर 2026 को सुनवाई की तारीख निर्धारित की है. अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक, विभागीय अथवा वसूली की कार्रवाई प्रभावित नहीं होगी. उन कार्यवाहियों का निपटारा कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से किया जायेगा.
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