- प्रार्थियों को मिला पूर्वजों की जमीन पर मालिकाना हक
- धारा 46 CNT Act लागू नहीं होती, क्योंकि यह प्रावधान 1947 के बाद आया
- CNT Act 71 के तहत 1 साल के अंदर दायर मुकदमे मान्य
- हाई कोर्ट ने डीसी जमशेदपुर का आदेश किया रद्द
- एलआरडीसी, घाटशिला का आदेश भी स्वतः निरस्त माना गया
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है. यह निर्णय हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने दिया. कोर्ट ने 22.11.1994 का डिप्टी कमिश्नर, जमशेदपुर का आदेश रद्द (set aside) कर दिया. 06.06.1986 का एलआरडीसी, में घाटशिला का आदेश भी स्वतः निरस्त माना गया.
क्या कहा हाईकोर्ट ने
धारा 71, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को जमीन से बेदखल (ejection) किया जाता है, तो उसे एक वर्ष के भीतर संबंधित उपायुक्त (Deputy Commissioner) के समक्ष आवेदन करना होता है.
लेकिन इस मामले में देखा जा रहा है कि 45 वर्ष बाद धारा 71 के तहत आवेदन दायर किया गया है, जो कि निर्धारित समय सीमा से बहुत अधिक विलंबित है. इस आधार पर सामान्यतः यह माना जाता है कि ऐसा आवेदन समय-सीमा (limitation) से बाहर है और इसे स्वीकार करने में कानूनी बाधा हो सकती है.
कोर्ट ने पाया कि पट्टा (1939) और रजिस्ट्रेशन (1940) वैध हैं और उससे याचिकाकर्ताओं का अधिकार स्थापित होता है. 1952 का सिविल कोर्ट का फैसला अंतिम (final) हो चुका है और उसे कभी चुनौती नहीं दी गई.
1964 के खतियान में नाम दर्ज होना भी याचिकाकर्ताओं के हक को मजबूत करता है. 45 साल बाद दायर बहाली आवेदन (Section 71 CNT Act) उचित समय के भीतर नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, इतनी देरी के बाद बहाली नहीं दी जा सकती. धारा 46 CNT Act लागू नहीं होती, क्योंकि यह प्रावधान 1947 के बाद आया.
कोर्ट ने प्रार्थियों परिमल कुमार महतो, रसिकलाल महतो, उत्पल कुमार महतो, सर्वेंदु महतो की याचिका को स्वीकार करते हुए मामला समाप्त कर दिया. इससे प्रार्थियों को पूर्वजों की जमीन पर मालिकाना हक मिला.
दरअसल, यह मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया क्षेत्र की जमीन से जुड़ा था. याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 1994 में डिप्टी कमिश्नर जमशेदपुर द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 1986 के एलआरडीसी घाटशिला (Land Reforms Deputy Collector) के फैसले को सही ठहराया गया था.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया था कि जमीन उनके पूर्वजों को 1939 में तत्कालीन जमींदार द्वारा पट्टा (Patta) के माध्यम से दी गई थी. 1940 में इसका रजिस्ट्रेशन हुआ और वे लगातार जमीन पर काबिज रहे. 1952 में सिविल कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला दिया था, जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई. 1964 के रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (खतियान) में भी उनके पूर्वज का नाम दर्ज है.
Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.


Leave a Comment