NewDelhi : किसी शख्स के नाम की स्पेलिंग में मामूली गलती या सरकारी रिकॉर्ड में टाइपिंग की त्रुटि की वजह से किसी को विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को यह टिप्पणी की. नागरिकता के मुद्दे को संवेदनशील मुद्दा करार देते हुए कहा कि इसका फैसला महज तकनीकी खामियों के आधार पर नहीं किया जा सकता.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय बेंच कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने की पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए. बता दें कि बेंच असम राज्य के 27 लोगों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी. इन लोगों को अलग-अलग फॉरेनर्स ट्रिब्यूनलों ने विदेशी घोषित कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनलों के आदेशों पर फिलहाल रोक लगा दी. साथ ही निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक इन 27 लोगों के खिलाफ कोई भी जबरिया कार्रवाई नहीं की जा सकती.हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सरकार का दायित्व है कि जो लोग कानूनन भारतीय नागरिक नहीं हैं, वे गलत तरीके या फर्जी दस्तावेजों के सहारे नागरिकता हासिल न कर पायें.
सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि इस मकसद की आड़ में किसी के साथ अन्याय नहीं किया जाना चाहिए.दरअसल याचिकाकर्ता साबित्री डे, अजबहार अली, मोहम्मद अकबर अली, आबेदा खातून और अनोवारा खातून समेत कई लोगों ने दावा किया है कि उन लोगों को मतदाता सूची सहित अन्य सरकारी रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर, टाइपिंग की गलती या दस्तावेजों में अन्य मामूली गलतियों क आधार पर विदेशी करार दे दिया गया.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि उसने अभी यह तय नहीं किया है कि याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक हैं या नहीं. सिर्फ इस बात पर जोर दिया कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल इनके सभी दस्तावेजों और सबूतों का निष्पक्ष तरीके से दोबारा परीक्षण करें. उसके बाद ही किसी फैसले पर आयें. मामले की तह में जायें तो इन याचिकाकर्ताओं ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 1971 से पहले के रिकॉर्ड, पुरानी वोटर लिस्ट, जमीन के कागज सहित पारिवारिक वंशावली से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत किये थे,लेकिन फिर भी ये सभी विदेशी घोषित कर दिये गये.
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