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‘शुभम संदेश’ पड़ताल : बुक डिपो बना स्कूल, कमीशनखोरी शुरू

विद्यालयों में घूम-घूम कर एजेंट साध रहे संपर्क स्कूल प्रबंधन को 50 से 60% कमीशन देने का दे रहे प्रलोभन यूनिफॉर्म बेचने वाले दुकानदार भी लगातार निजी विद्यालयों से कर रहे बातचीत जिसका कमीशन ज्यादा, स्कूल में उसी की बिकेगी किताब और अन्य सामान Pramod Upadhyay Hazaribagh : जैसे-जैसे नए सत्र नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे पुस्तक कारोबारी भी स्कूलों में दस्तक देते नजर आ रहे हैं. जिले के कई निजी विद्यालय बुक डिपो में तब्दील हो गए हैं. कहीं नए सत्र की पूरी पुस्तक, तो कहीं नए पाठ्यक्रम के सैंपल पहुंचने लगे हैं. इसके साथ ही पुस्तकों की खरीद-बिक्री में कमीशनखोरी भी शुरू हो चुकी है. निजी विद्यालयों में घूम-घूम कर एजेंट संपर्क साध रहे हैं. स्कूल प्रबंधन को 50 से 60 फीसदी कमीशन देने का प्रलोभन दिया जा रहा है. यूनिफॉर्म, टाई और बेल्ट बेचने वाले दुकानदार भी लगातार निजी विद्यालयों से बातचीत कर रहे हैं. गोटी उन्हीं की सेट होगी, जिनका कमीशन भारी-भरकम होगा. इसे भी पढ़ें: 1932">https://lagatar.in/1932-not-possible-block-wise-planning-policy-salkhan-murmu/">1932

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स्कूल संचालक कमाई के नये-नये तरीके तलाश रहे

हजारीबाग जिले में प्राइवेट स्कूल के संचालक ऑफिस में बैठे-बैठे मार्केटिंग कर रहे हैं. इसमें स्कूल ड्रेस, किताब, डायरी, आई कार्ड, यहां तक कि जूते-मौजे के भी एजेंट निजी विद्यालयों का दौरा कर रहे हैं. ऐसे में बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना अब अभिभावक को महंगा पड़ने लगा है. पहले फ्री एडमिशन के नाम पर निजी स्कूल के संचालक मोटी रकम वसूलते थे. कभी सरस्वती पूजा, तो कभी गणतंत्र व स्वतंत्रता और शिक्षक दिवस, तो कभी स्कूल में वार्षिक शुल्क का पैसा अभिभावकों को भरना पड़ता था. सरकार के निर्देश पर री-एडमिशन का प्रावधान बंद कर दिया गया. इसके बाद अब स्कूल में अतिरिक्त कमाई के नए-नए विकल्प संचालक तलाश रहे हैं. कई प्रकाशक के एजेंट भी सस्ती एवं लोकल किताब स्कूलों में चलाने के लिए आकर्षक उपहार तक देने का प्रलोभन दे रहे हैं.

अभिभावकों ने बयां की अपनी पीड़ा

इस संबंध में अमृतनगर के श्रीकांत सिंह, प्रभु यादव, सुमन कुमारी समेत कई अभिभावकों ने बताया कि निजी स्कूल में पढ़ाना मुश्किल नहीं, नामुमकिन जैसा हो गया है. पहले नामांकन के नाम पर दिखावे के लिए फॉर्म, फिर परीक्षा के लिए आवेदन भरवाया जाता है. इसकी एवज में 1000 से 1500 रुपए प्रति छात्र दोहन किए जाते हैं. उसके बाद परीक्षा लेकर रिजल्ट भी नहीं देते हैं. स्कूल प्रबंधन सीधा फेल होने की बात कह कर पैरवी करवाते हैं. उसके बाद किसी बड़े पैरवीकार के माध्यम से नामांकन तो होता है, लेकिन उसके बाद भी मोटी रकम ऐंठते हैं. उस पर स्कूल से ही किताब, कॉपी, बेल्ट, टाई, आई कार्ड आदि की फीस जमा करवा लेते हैं. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/01/ppp-2-4.jpg"

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डीसी से मिलना है आसान, प्रिंसिपल करते हैं घंटों परेशान

पबरा के आनंद कुमार मेहता ने बताया कि डीसी से मिलना आसान है, लेकिन प्रिंसिपल तीन-तीन दिन में भी मुलाकात नहीं करते. उनके बच्चे का नर्सरी के लिए पहले स्कूल में फॉर्म भरवाया गया. बाद में परीक्षा हुई और रिजल्ट नहीं दिया गया. जब इस संबंध में मोंटफोर्ट स्कूल के प्रिंसिपल से बात करने का प्रयास किया गया, तो तीन दिन बीत जाने के बाद भी उनसे मुलाकात संभव नहीं हुई. जब मुलाकात हुई, तो उन्होंने कहा कि उनका बच्चा फेल कर गया है, इसलिए नामांकन नहीं होगा. आनंद कुमार कहते हैं कि फेल बच्चे का भी उस विद्यालय में नामांकन हुआ है. [wpse_comments_template]

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