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चंद लोगों ने जीवित रखी है परंपरागत फाल्गुन गीत
जहां पहले जोगीरा सा रा रा रा… आवाज के साथ ढोलक और मदीरे की धुन गली-गली में गूंजा करती थीं. हर एक आदमी फगुआ के रंग में रंग जाता था. अब भी कुछ ऐसे युवा और बुजुर्ग हमारे समाज में हैं, जो इस लोकगीत को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं. हजारीबाग के फाग कलाकार परशुराम दूबे और फगुआ के शौकीन अजीत सिंह मंडली बनाकर फगुआ के गीत गाकर लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि फगुआ सिर्फ गीत नहीं, बल्कि यह हमारी परंपरा है.हमारी परंपरा और विरासत का अंग है फगुआ गीत
लोक गायक परशुराम दूबे और अजीत सिंह कहते हैं कि फगुआ सिर्फ गीत ही नहीं, हमारी परंपरा और विरासत का अंग है. एक दौर था जब फगुआ की गूंज सुनने को मिलती थी. फगुआ के शौकीन अपने काम निपटा कर शाम के वक्त मंडली बना बना कर फगुआ की गीत गाया करते थे. बिहार और यूपी के अधिकतर गांवों में वसंत पंचमी के बाद से होली तक यह गीत सुनने को मिलता था. फगुआ लोकगीत गाने के बाद दुश्मन भी दोस्त बनकर घर घर फगुआ गाने के लिए निकल जाया करते थे.रंग खेलने के बाद शाम को गुलाल के साथ अच्छे कपड़े पहन कर मर्दों की टोली ढोल नगाड़ा और मंजिरे के साथ गांव के सभी घरों में जाकर जमकर फगुआ गाते थे.फगुआ गीत के बिना रंगों का त्योहार अधूरा
आज के दौर में भले हम आधुनिकता को लेकर कितनी ही दावा कर ले लेकिन फगुआ के बिना होली का त्योहार अधूरा है. होली खेरे रघुवीरा…,योगी जी वाह, योगी जी धीरे-धीरे, नदी के तीरे-तीरे…,भोले मेरे मन बसिया… कुछ ऐसे फगुआ के गीत हैं, जो होली के त्योहार को परवान चढ़ा देते हैं. फगुआ के गीतकार डॉ प्रह्लाद सिं भी कहते हैं कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी अपनी परंपरा को भूलते जा रहे हैं. पाश्चात्य सभ्यता हमारे समाज में जगह बना ली है. इस कारण भी फगुआ गीत धीरे-धीरे समाज से दूर होते जा रहे हैं. भारत की सभ्यता-संस्कृति और विरासत की पूरे विश्व में पहचान है. ऐसे में जरूरत है कि इन फगुआ गीतों को फिर से जीवित करने का प्रयास होना चाहिए. इसे भी पढ़ें :अरका">https://lagatar.in/arka-jain-university-rally-and-salad-fair-organized-on-world-obesity-day/">अरकाजैन यूनिवर्सिटी : वर्ल्ड ओबेसिटी डे पर रैली व सलाद फेयर आयोजित

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