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होली पर खास : हजारीबाग में गुजरे दिनों की बात हो गई फगुआ के गीत

Gaurav Prakash Hazaribagh : हजारीबाग में फगुआ के गीत गुजरे दिनों की बात हो गई. लोग टोली बनाकर निकलते थे और पारंपरिक फाग के राग बिखरते थे. खासकर मंदिरों में साधु-संतों, खानाबदोशों और ग्रामीण क्षेत्र के बुजुर्गों की टोलियां बांधकर फागुन से जुड़े लोकगीत न सिर्फ गाते थे, बल्कि सारंगी, करताल, झांझर, ढोलक आदि पारंपरिक वाद्ययंत्रों से कर्णप्रिय सुर भी बिखेरते थे. फाग के यह राग वसंत पंचमी के बाद से ही शुरू हो जाती थी, तो होली तक चलती थी. धीरे-धीरे फाग का यह लोक गीत विलुप्त होता चला गया. इसकी जगह ताशा, मोबाइल और डीजे ने ले ली है. होली में गानों के नाम पर सिर्फ हुड़दंग देखने को मिलता है. अब शायद ही फगुआ के पारंपरिक गीत सुनने को मिलते हैं. इसे भी पढ़ें :रामगढ़">https://lagatar.in/demand-to-remove-rajesh-thakur-from-the-state-president-on-the-defeat-of-ramgarh-by-election/">रामगढ़

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चंद लोगों ने जीवित रखी है परंपरागत फाल्गुन गीत

जहां पहले जोगीरा सा रा रा रा… आवाज के साथ ढोलक और मदीरे की धुन गली-गली में गूंजा करती थीं. हर एक आदमी फगुआ के रंग में रंग जाता था. अब भी कुछ ऐसे युवा और बुजुर्ग हमारे समाज में हैं, जो इस लोकगीत को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं. हजारीबाग के फाग कलाकार परशुराम दूबे और फगुआ के शौकीन अजीत सिंह मंडली बनाकर फगुआ के गीत गाकर लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि फगुआ सिर्फ गीत नहीं, बल्कि यह हमारी परंपरा है.

हमारी परंपरा और विरासत का अंग है फगुआ गीत

लोक गायक परशुराम दूबे और अजीत सिंह कहते हैं कि फगुआ सिर्फ गीत ही नहीं, हमारी परंपरा और विरासत का अंग है. एक दौर था जब फगुआ की गूंज सुनने को मिलती थी. फगुआ के शौकीन अपने काम निपटा कर शाम के वक्त मंडली बना बना कर फगुआ की गीत गाया करते थे. बिहार और यूपी के अधिकतर गांवों में वसंत पंचमी के बाद से होली तक यह गीत सुनने को मिलता था. फगुआ लोकगीत गाने के बाद दुश्मन भी दोस्त बनकर घर घर फगुआ गाने के लिए निकल जाया करते थे.रंग खेलने के बाद शाम को गुलाल के साथ अच्छे कपड़े पहन कर मर्दों की टोली ढोल नगाड़ा और मंजिरे के साथ गांव के सभी घरों में जाकर जमकर फगुआ गाते थे.

फगुआ गीत के बिना रंगों का त्योहार अधूरा

आज के दौर में भले हम आधुनिकता को लेकर कितनी ही दावा कर ले लेकिन फगुआ के बिना होली का त्योहार अधूरा है. होली खेरे रघुवीरा…,योगी जी वाह, योगी जी धीरे-धीरे, नदी के तीरे-तीरे…,भोले मेरे मन बसिया… कुछ ऐसे फगुआ के गीत हैं, जो होली के त्योहार को परवान चढ़ा देते हैं. फगुआ के गीतकार डॉ प्रह्लाद सिं भी कहते हैं कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी अपनी परंपरा को भूलते जा रहे हैं. पाश्चात्य सभ्यता हमारे समाज में जगह बना ली है. इस कारण भी फगुआ गीत धीरे-धीरे समाज से दूर होते जा रहे हैं. भारत की सभ्यता-संस्कृति और विरासत की पूरे विश्व में पहचान है. ऐसे में जरूरत है कि इन फगुआ गीतों को फिर से जीवित करने का प्रयास होना चाहिए. इसे भी पढ़ें :अरका">https://lagatar.in/arka-jain-university-rally-and-salad-fair-organized-on-world-obesity-day/">अरका

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आधुनिक डीजे नहीं ले सकता फगुआ के मीठे रस की जगह

हजारीबाग के मटवारी निवासी फगुआ गायक उमेश कुमार कहते हैं कि वर्तमान में होली में फगुआ का महत्व खुशी वही जान सकता है, जिसने इन स्वर्णिम दिनों को जिया है. धीरे-धीरे गांव में भी फैलती शहरी आधुनिकता ने डीजे और लाउड म्यूजिक के प्रचलन को बढ़ा दिया है. लेकिन आज भी फगुआ के मीठे रस की जगह शायद ही कोई ले पाए. [wpse_comments_template]

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