Amarnath Pathak
Hazaribagh: सूचना अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के 17 वर्ष बुधवार को पूरे हो गए. इस अवसर पर सूचना अधिकार रक्षा मंच ने पुराना समाहरणालय में एक कार्यक्रम का आयोजन किया. इस मंच ने आरटीआई दिवस को मांग दिवस के रूप में मनाया. इसमें मंच के सदस्यों ने राज्य सूचना आयोग में आयुक्त की बहाल करने की मांग की. सूचना अधिकार रक्षा मंच ने कहा कि "राइट टू इनफार्मेशन" को सूचना देने वालों ने "राइट टू इग्नोर" बना दिया है. मंच के सचिव गणेश कुमार सीटू ने कहा कि अंग्रेजों ने 1923 में ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट लागू कर जनता के सूचना के अधिकार पर कुठाराघात किया था. उसके खिलाफ लगातार संघर्ष चलता रहा. दशकों के संघर्ष के बाद सूचना अधिकार अधिनियम 2005 लागू हुआ.
सीटू ने कहा कि संघर्ष के कारण ही सूचना का अधिकार कानून स्वरूप आम जनता के सामने आया. सूचना की मांग करने वाले आरटीआई का अर्थ सूचना प्राप्त करने का " राइट टू इनफार्मेशन" समझते हैं, जबकि सूचना देने वाला तबका इसका मतलब " राइट टू इग्नोर" समझता है. जो सरासर गलत है. सीटू ने कहा कि झारखंड में राज्य सूचना आयोग दम तोड़ चुका है. वर्ष 2018 से सूचना आयुक्त के सभी 11 पद रिक्त पड़े हैं. इस वजह से कम से कम द्वितीय अपील के बाद के करीब 50 हजार आवेदनों पर सुनवाई नहीं हो पायी है. इसी का फायदा जनसूचना और अपीलीय पदाधिकारी उठा रहे हैं कि आगे तो सुनवाई होनी नहीं है.
प्रथम अपील में प्रभावी सुनवाई नहीं होती है : मनोज कुमार
झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ के जिला कार्यकारी अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि प्रायः सभी जन सूचना पदाधिकारी सही सूचना समय पर नहीं देते हैं. प्रथम अपील में प्रभावी सुनवाई नहीं होती है. झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष मो. अतिकुज्जमा ने कहा कि हजारीबाग शिक्षा विभाग में तो आरटीआई की स्थिति काफी खराब है. यहां वर्षों तक स्थायी प्रथम अपीलीय पदाधिकारी नहीं थे. इस कारण समय पर और प्रभावी सुनवाई नहीं होती थी. जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय पदाधिकारी के पदों पर एक ही व्यक्ति को प्रभार दे दिया गया था. ऐसे में सुनवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती रहती थी. अभी दोनों पदों पर अलग-अलग पदाधिकारी की नियुक्ति हुई है पर सुनवाई में जन सूचना अधिकारी स्वयं उपस्थि न होकर किसी सहायक को भेज देते हैं. अपीलीय अधिकारी को भी यह पता नहीं है कि सुनवाई के लिए भी अधिकतम समय सीमा निर्धारित है, फिर भी महीनों बाद सुनवाई की जाती है.
बता दें कि सूचना अधिकार का सर्वाधिक इस्तेमाल कर कार्रवाई कराने के मामले में हजारीबाग के दो शख्स मिसाल बने हैं. इनमें एक शख्स शिक्षक मनोज कुमार और दूसरा सीपीएम के जिला सचिव गणेश कुमार वर्मा उर्फ सीटू हैं. शिक्षक मनोज कुमार ने एक हजार से अधिक बार आवेदन से न सिर्फ शिक्षा विभाग की कई जानकारी हासिल की, बल्कि कई मामले में सकारात्मक कार्रवाई भी हुई. इससे पीड़ितों को न्याय भी मिला. एक केस में उन्हीं की देन है कि अब हजारीबाग के सरकारी स्कूलों में फर्जी नामांकन का गोरखधंधा नहीं चलता है.
आरटीआई से ही उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय हजारीबाग में फर्जी नामांकन का गोरखधंधा उजागर किया था. उसमें तत्कालीन डीइओ राजेंद्र प्रसाद, नौ बीइइओ और 14 प्रधानाध्यापकों पर विभागीय कार्रवाई हुई थी और नौनिहालों को न्याय मिला था. आरटीआई के आवेदन से उन्होंने ऐसे कई मामले उजागर किए. कई शिक्षकों को भी न्याय दिलाया. आज भी उनका और संघ की ओर से आरटीआई का अभियान जारी है. वहीं सीटू ने स्वास्थ्य विभाग में आरटीआई का आवेदन डालकर कई कार्रवाई कराई. सदर अस्पताल को बेहतर बनाने की कोशिश में अपनी महती भूमिका निभाई. उन्होंने अब तक तीन हजार से अधिक आवेदन आरटीआई के लिए दिए हैं.
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इस कार्यक्रम में भाजपा जिला मंत्री नंदलाल प्रसाद मेहता, आजसू नेता विजय कुमार वर्मा, कांग्रेस नेता संजय तिवारी, राजू चौरसिया सीपीआई के नेता महेंद्र राम, शौकत अनवर राजू, सीपीएम के नेता ईश्वर महतो, तपेश्वर राम, विपिन कुमार सिन्हा, विजय मिश्रा, चितरंजन गुप्ता, पंकज कुमार दास, मुखलाल प्रसाद मेहता, अनिल कुमार, तेज नारायण राम, नरेंद्र प्रसाद, नंदकिशोर राणा, धनेश्वर पासवान और राजेश मेहता ने राज्य सूचना आयोग में आयुक्त की बहाल करने की मांग की.
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