Lagatar Desk : दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज ओटीटी से हटाने के साथ ही काफी विवादों में है.यह फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. वह एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिन्होंने 1980 और 90 के दशक के पंजाब में कथित तौर पर गायब हुए हजारों सिखों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के मामलों की निडरता से जांच की थी
OTT से हटने के बाद बढ़ा विवाद
करीब तीन साल तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रहने के बाद फिल्म को OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया था. हालांकि रिलीज के महज दो दिन बाद, 5 जुलाई को इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया. इसके बाद पंजाब के कई इलाकों में सिख धार्मिक संगठनों और अन्य सामाजिक संस्थाओं ने गांवों में फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग शुरू कर दी.
सुखबीर बादल का बड़ा बयान
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पंजाबी भाषा में पोस्ट साझा करते हुए कहा कि अकाली दल पंजाब के हर गांव और हर कोने में 'सतलुज' फिल्म दिखाएगा. उन्होंने कहा कि यह फिल्म कांग्रेस शासन के दौरान हजारों निर्दोष सिख युवाओं और शहीद भाई जसवंत सिंह खालड़ा जैसे लोगों पर हुए कथित अत्याचारों को सामने लाती है. उनका कहना था कि आने वाली पीढ़ियों को इतिहास के इस दौर से अवगत कराना जरूरी है, ताकि वे उस समय की घटनाओं को समझ सकें.
क्या है 'सतलुज' की कहानी
हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी फिल्म 'सतलुज' मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में बड़ी संख्या में अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जांच की थी. वर्ष 1995 में वे रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए थे.
बाद में वर्ष 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मचारियों को उनके अपहरण और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया. शुरुआती तौर पर उन्हें सात साल की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में 2007 में ने बढ़ाकर उम्रकैद में बदल दिया.


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